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विकलांग भी शामिल हैं दांडी यात्रा में | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दांडी यात्रा ने लोगों को गाँधी के प्रति श्रद्धा भाव से भर दिया है. इस यात्रा में जहाँ सैंकड़ों लोग चल रहे हैं. वहाँ ऐसे अनेक लोग हैं जो शारीरिक विकलांगता के बावजूद यात्रा में शामिल हुए हैं. बापू का पैग़ाम और वतनपरसती के नारों ने भावनाओं का ऐसा प्रवाह पैदा किया कि अपाहिज होने के बावजूद डांडी के लिए निकल पड़े. साबरमती से संत की स्मृति में सड़क पर सैलाब उमड़ा तो खेड़ा ज़िले के विकलांग खुद को रोक नहीं पाए. अपनी ट्राइसाइकिल उठाई और हाथों से पहिए घुमाते हुए यात्रा का हिस्सा बन गए. दोनों पाँवों से लाचार वासन के टंडन भाई कहते हैं, ''उन्हें बापू का नाम और उनके भजनों ने आकर्षित किया तो यात्रा में शामिल हो गए.'' पूरा साथ विकलांग मंडल के अध्यक्ष राकेश चावड़ा ने बताया कि एक दर्जन विकलांग 50 किमी तक यात्रा का साथ निभाएंगे.
चावड़ा कहते हैं, ''आज पग-पग पर बापू की जरूरत है. भारत गाँधी का अनुसरण करे तो देश की किस्मत संभल सकती है.'' बापू की यात्रा के बुलावे पर बसंत पंवार भोपाल से साबरमती चले आए. दुर्घटना में अपने दोनों पाँव खो चुके पंवार दांडी तक यात्रा में साथ चल रहे हैं. वे कहते हैं, ''‘बापू ने स्वावलंबन का संदेश दिया, कहा अपना काम खुद करो. विकलांग होने के बावजूद मैं सारा अपना काम स्वयं करता हूँ. बापू सब को साथ लेकर चलते थे. इसी से प्रभावित होकर मैं यात्रा में शामिल हुआ हूँ. यहाँ सब मेरा ख्याल रखते हैं.'' सबल को सलाम, भारत की सियासत का दस्तूर बन चुका है. बापू कहते थे-निर्बल के बल राम. गाँधी आज होते तो अपनी इस यात्रा में इन विकलांगों का सबसे ज़्यादा खयाल रखते. |
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