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दुनियाभर में विशेष स्थान है हिंदी फ़िल्मों का | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दादा फाल्के जब सिनेमा बनाने के प्रयास में जुटे थे, तब उनके मस्तिष्क में यह बात नहीं रही होगी कि उनकी यह पहल एक विशाल उद्योग व मनोरंजन इकाई का रूप भी ले सकती है. नासिक में की गई इस पहल का पहला परिणाम था 'राजा हरीशचंद्र' फ़िल्म, जो एक मूक फ़िल्म थी. समय बदला, नए लोग जुड़े, तकनीक का विकास हुआ और सन 1931 में 'आलम आरा' के पात्र, रुपहले पर्दे पर बोल उठे. चित्र और भाव के साथ फ़िल्मों से भाषा का जुड़ाव और इस भारतीय फ़िल्म की भाषा हिंदी थी. जो बात चित्रों व भावों के माध्यम से कठिनता से समझाई जाती थी, वह भाषा के जुड़ जाने से मनोरंजक व आसानी से समझने योग्य हो गई. फ़िल्म में भाषा का जुड़ जाना एक नए युग का आह्वान था क्योंकि मनुष्य को भाषा ही अन्य प्राणियों से अलग करती है. अनपढ़ व्यक्ति भी अपनी भाषा सुनकर समझ सकता है. सन 1931 में आर्देशिर ईरानी की पहल रंग लाई और भारत में एक भाषा से अनेक भाषाओं में फ़िल्में बनने लगीं. फिल्में बहुभाषायी हो गईं. मील के पत्थर भाषाओं पर वृहद स्तर पर प्रयोग हुए. उपन्यासों, उपनिषदों, साहित्य को फ़िल्मों के माध्यम से सरल रूप में लोगों के समझने लायक बनाया गया. मुंशी प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, बंकिमचंद चट्टोपाध्याय, शरतचंद्र जैसे अनेक उपन्यासकारों व साहित्यकारों की कृतियों को फ़िल्मों के माध्यम से नया रूप दिया गया. शरत बाबू के उपन्यास 'देवदास' पर चार फ़िल्में बन चुकी हैं. यह उपन्यास मूल रूप से बंगाली भाषा में लिखा गया है. फ़िल्मों ने भाषागत सीमा को समाप्त कर दिया है. मराठी साहित्य, बंगाली साहित्य, उड़िया, तमिल, तेलुगू साहित्यों को हिंदी भाषा में रूपांतरित कर उन्हें सिल्वर स्क्रीन पर दिखाया गया व दिखाया जाएगा. शुरुआत में जहाँ फ़िल्में हिंदी, मराठी व बंगाली भाषा में बनाई जाती थीं व उनका सीमित स्थान था वहीं आज भोजपुरी, तमिल, तेलुगू, मलयालम, अंग्रेज़ी व अनेक देशी भाषाओं में फ़िल्में बनने लगी हैं. हिंदी भाषा की समृद्धि के पीछे हिंदी फ़िल्मों का विशेष योगदान रहा है क्योंकि फ़िल्मों में एक ऐसी भाषा प्रयोग में लाई जाती है जो सबके समझने योग्य हो. कई दूसरी भाषा की फ़िल्मों का हिंदी भाषा में निर्माण हमें अवसर उपलब्ध कराता है, उन फ़िल्मों को समझने का. आज का दौर आज देश में फ़िल्म निर्माण अपने चरम पर है. प्रतिवर्ष सैकड़ों हिंदी फ़िल्में बनती हैं तथा भारत ही नहीं, विदेशों में पुरस्कृत व पसंद की जाती हैं. हिंदी भाषा के संवाद आज प्रभावी ढंग से जनमानस पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं. फ़िल्मों के गीत आज हर जुबान पर हैं. हिंदी भाषा की फ़िल्म 'लगान' व 'पहेली' ऐसी फ़िल्में हैं जो ऑस्कर अवार्ड की कतार में शामिल हुई हैं. चीनी भाषा के बाद, हिंदी भाषा आज दुनिया की सबसे ज़्यादा समझी व बोली जाने वाली भाषा बन गई है. इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है विश्व स्तर पर सर्वाधिक हिंदी फ़िल्मों का निर्माण व उसका देखा जाना. कनाडा, ब्रिटेन व अमरीका सहित कई ऐसे देशों में बसे भारतीय आज हिंदी फ़िल्मों को ही देखना पसंद कर रहे हैं. हिंदी फ़िल्मों की लोकप्रियता के चलते पाकिस्तान सरकार ने इनके प्रदर्शन तक पर रोक लगा दी है. यह स्पष्ट बताता है कि हिंदी भाषा व हिंदी फ़िल्में किसी को भी झकझोर पाने में सक्षम है. | इससे जुड़ी ख़बरें आईआईएमसी में वेब पत्रकारिता कार्यशाला10 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस अपेक्षा से अधिक अच्छा रहा यह अनुभव10 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस भोपाल में हुई पत्रकारिता कार्यशाला 08 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस बीबीसी की पत्रकारिता कार्यशाला इंदौर में06 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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