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नेपाल में चुनाव से पहले संशय का माहौल

नेपाल
नेपाल में चुनाव का ख़ुमार ज़ोरों पर है
नेपाल में राजनीतिक पार्टियाँ जहाँ चुनाव प्रचार के लिए घर-घर जा रही हैं, वही एफ़एम रेडियो स्टेशनों पर भी चुनाव का नशा छाया है.

नेपाल का चुनाव आयोग इन स्टेशनों पर लोगों को मतदान में हिस्सा लेने के लिए उत्साहित कर रहा है. वहीं राजनीतिक पार्टियाँ विज्ञापनों के ज़रिए मतदाताओं को लुभाने के लिए इस सशक्त माध्यम का इस्तेमाल कर रही हैं.

बस, टैक्सी, चाय की दुकान.. जहाँ देखो एफ़एम स्टेशनों ने चुनावी चर्चा को गरमाया हुआ है. ख़ैर मुद्दा एफ़एम पर ख़बरों का नहीं बल्की 10 अप्रैल को होने वाले संविधानसभा के चुनाव के माहौल का है.

नेपाल मे अतंरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की भारी मौजूदगी में सभी राजनीतिक दल चुनाव मैदान में है और 10 अप्रैल को होने वाले चुनावों को एतिहासिक बता रहे हैं.

पर अगर राजनीतिक माहौल की बात करें तो माहौल आशंकाओं का है और इन आशंकाओं के केंद्र में है नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी.

संशय का माहौल

नेपाल में फ़िलहाल अंतरिम सरकार में शामिल सात पार्टियों के बीच हुई सहमति के अनुसार संविधान सभा के चुनाव के बाद उसकी पहली बैठक में ये तय किया जाएगा की नेपाल में राष्ट्रपतिय प्रणाली की सरकार का गठन हो या फिर कार्यकारी अधिकार प्रधानमंत्री के पास हों और राष्ट्रपति सांकेतिक पद ज़्यादा हो.

पर सीपीएन माओवादी ने चुनाव से पहले ही अपने अध्यक्ष प्रचंड को नेपाल का पहला भावी राष्ट्रपति घोषित कर दिया है.

उसके इस क़दम से नेपाल की दूसरी राजनीतिक पार्टियों में ये आशंका घर कर गई है कि माओवादी संविधान सभा में बहुमत पाने के लिए हिंसा का सहारा ले सकते हैं.

हांलाकि सीपीएन माओवादी के सचिव मंडल के वरिष्ठ सदस्य मोहनबैद्य किरण इन आशंकाओं को निर्मूल मानते हैं.

लेकिन नेपाल की दो दूसरी बड़ी पार्टियाँ सीपीएन यूएमएल और नेपाली कांग्रेस के नेता कहते हैं की माओवादी अभी से हिंसा पर उतर आए हैं.

गणतंत्र बना रहे...

 चुनाव को हमने शांति प्रक्रिया का अंग मान लिया है, इसलिए हम इसको अंजाम तक ले जाना चाहते हैं. फिर भी माओवादी लोग हिंसा का भड़का रहे है
बिष्णु रिमाल

वैसे पार्टियां ये भी कह रही हैं की वो हिंसा के चलते गणतंत्र की तरफ़ नेपाल के बढ़ते क़दमों को पीछे नही हटने देगें.

सीपीएन यूएमएल के केन्द्रीय कमेटी सदस्य बिष्णु रिमाल कहते हैं, " चुनाव को हमने शांति प्रक्रिया का अंग मान लिया है, इसलिए हम इसको अंजाम तक ले जाना चाहते हैं. फिर भी माओवादी लोग हिंसा का भड़का रहे है. बड़े नेता बोलते हैं कि हम ऐसा नहीं करेंगे लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. इससे हमें आशंका है कि ये लोग बूथ पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर सकते हैं, हिंसा भड़का सकते हैं. हमें ही कुछ समझौता करना पड़ेगा. हम अपनी ओर से प्रतिरक्षा की तैयारी कर रहे हैं."

उधर नेपाली कांग्रेस का भी आरोप है की माओवादी हिंसा का सहारा ले रहे हैं.

पर पार्टी मानती है की अगर नेपाल की संविधानसभा में माओवादी अपनी बात नहीं मनवा पाते हैं तो भी उनके पास अब इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर जाने का विकल्प नहीं है.

इसका कारण है भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव. नेपाली कांग्रेस मुख्य सचिव जीवनप्रकाश श्रेष्ठ कहते हैं, "यहाँ अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक बहुत सारे आए हैं. चुनाव में जो नतीजा आएगा माओवादियों को उसे मानना ही पड़ेगा. लोकतंत्र से बाहर जाने का उनके पास विकल्प नहीं है."

हांलाकि माओवादी नेता इन पार्टियों की आशंकाओ और आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं की हिंसा की छिटपुट घटनाओं को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जा रहा है.

इसके साथ ही ये नेता ये भी कह रहे हैं की उन्हें भी आशंका है कि माओवादीयों को हराने के लिए चुनाव मे धांधली हो सकती है

पर माओवादियों का कहना है की वो नेपाल मे गणतंत्र की स्थापना के लिए कटिबद्ध है.

कुल मिलाकर नेपाल मे कुल 601 सीटों में से 240 सीटों पर सीधे चुनाव और 335 सीटों के लिए अनुपातिक पद्धति से होने वाले मतदान के लिए चुनावप्रचार लगभग सामाप्त हो चला है.

पर जैसे जैसे समय क़रीब आ रहा है तस्वीर साफ़ होने की बजाए स्थिति पेचिदा होती नज़र आ रही है.

चुनाव मे हिंसा की आशंका और माओवादीयों के हठ के अलावा भी कई सवाल हैं- जैसे तराई के इलाके में मधेशियों को इन चुनावों मे कितनी सफलता मिलेगी, राजशाही की समर्थक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी का क्या होगा, क्या आम नेपाली एतिहासिक बताई जा रही इस प्रक्रिया मे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेगा.

और सबसे बड़ा सवाल ये कि अगर किसी भी पार्टी को संविधान सभा मे स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो किस तरह के गठबंधन बन सकते हैं. इन सवालों के जवाब शायद आसान नहीं है.

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