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नेपाल में चुनाव की नई तारीख़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल सरकार ने देश में भावी राजनीतिक व्यवस्था के बारे में फ़ैसला करने के लिए होने वाले चुनावों की तारीफ़ 10 अप्रैल तय की गई है. नेपाल के मंत्रिमंडल ने तीन मुख्य राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बातचीत के बाद यह घोषणा की है. इन तीन दलों में पूर्व माओवादी विद्रोहियों की पार्टी भी शामिल है. ये चुनाव मूल रूप से वर्ष 2007 में होने थे लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मतभेद की वजह से दो बार स्थगित हो चुके हैं. इन चुनावों के तहत मतदाता एक ऐसी एसेंबली का चुनाव करेंगे जो देश के लिए एक नया संविधान तैयार करेगी जिसमें देश को औपचारिक रूप से एक गणतंत्र घोषित किया जाएगा. नेपाल में अभी तक सदियों से राजतंत्र रहा है. देश की मुख्य धारा के राजनीतिक दलों और माओवादी विद्रोहियों के बीच वर्ष 2006 में एक शांति समझौता हुआ था जिसकी एक प्रमुख शर्त ये थी कि राजतंत्र समाप्त करके देश में लोकतांत्रिक गणतंत्र स्थापित किया जाए. उस समझौते के साथ ही देश में क़रीब एक दशक से चला आ रहा माओवादि विद्रोही आंदोलन समाप्त हुआ था. राजा पर मतभेद माओवादी विद्रोही इस शांति समझौते के बाद अंतरिम सरकार में शामिल हुए थे लेकिन सितंबर 2007 में अंतरिम सरकार से बाहर हो गए थे जिससे शांति प्रक्रिया पर बादल मंडराने लगे थे. सबसे पहले तो चुनाव जून 2007 में निर्धारित किए गए थे और उन्हें स्थगित करके ये चुनाव नवंबर 2007 में कराने का ऐलान किया गया था लेकिन राजनीतिक दलों में इस बात पर मतभेद थे कि देश को एक गणतंत्र कब घोषित किया जाए. माओवादी नेताओं की माँग रही है कि राजतंत्र को तुरंत समाप्त किया जाए जबकि अन्य राजनीतिक दलों की दलील है कि इस मुद्दे को चुनाव के बाद बनने वाली संविधान सभा पर छोड़ देना चाहिए, उसमें जो राय बनेगी उसी के अनुसार इस बारे में फ़ैसला हो जाएगा.
दिसंबर 2007 में राजनीतिक दलों में सहमति बन गई थी कि राजतंत्र को समाप्त किया जाए लेकिन चुनाव होने के बाद. इस वादे के बाद माओवादी विद्रोही फिर से सरकार में शामिल होने के लिए तैयार हो गए लेकिन इस फ़ैसले को अप्रैल में होने वाले चुनाव के बाद बनने वाली संविधान सभा में बहुमत से मंज़ूरी मिलनी चाहिए. संवाददाताओं का कहना है कि नेपाल में शाही व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त करना एक दूरगामी निष्कर्ष होगा. नेपाल में पिछले क़रीब नौ साल में कोई चुनाव नहीं हुए हैं और दस अप्रैल को जो चुनाव नौ साल में पहली बार होंगे. मंत्रियों का कहना है कि चुनाव की तारीख़ के बारे में मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को फ़ैसला किया. नेपाल के श्रम और परिवहन मंत्री रमेश लेखक ने मंत्रिमंडल की बैठक के बाद बताया, "हमने चुनाव की तारीख़ दस अप्रैल निर्धारित की है." राजनीतिक संकट नेपाल में जून 2001 में शाही निवास में सम्राट बीरेंद्र और उनके परिवार के अनेक सदस्यों की हत्या के बाद राज परिवार की लोकप्रियता बहुत कम हुई है. शाह बीरेंद्र को काफ़ी लोकप्रिय माना जाता था. शाह बीरेंद्र के बाद गद्दी पर बैठे उनके भाई शाह ज्ञानेंद्र ने माओवादी विद्रोही गतिविधियों को बंद करने की भरसक कोशिश की लेकिन उससे मानवाधिकार उल्लंघन के हालात में और ख़राबी आई. विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2005 में सरकार को बर्ख़ास्त करने के बाद शाह ज्ञानेंद्र की लोकप्रियता काफ़ी कम हो गई थी. शाह ने सरकार बर्ख़ास्त करके तमाम कार्यकारी शक्तियाँ अपने हाथों में ले ली थीं जिसके बाद देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे और लोकतंत्र समर्थक आंदोलन ने तेज़ी पकड़ ली थी. शाह ज्ञानेंद्र ने जब अप्रैल 2006 में अपना सीधा शासन समाप्त करने की घोषणा कर दी तो माओवादी विद्रोही संघर्षविराम के लिए तैयार हो गए. उसी के साथ संसद भी बहाल कर दी गई थी. | इससे जुड़ी ख़बरें माओवादी मंत्रिमंडल में शामिल हुए31 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस सरकार में शामिल हुए माओवादी30 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस राजशाही ख़त्म करने को मंज़ूरी28 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस नेपाल में राजशाही ख़त्म करने पर सहमति24 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस ख़तरे में है नेपाल में लोकतंत्र 09 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस नेपाल में संविधानसभा का चुनाव टला05 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस नेपाल में माओवादी सरकार से अलग हुए18 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'राजशाही ख़त्म नहीं, तो चुनाव में बाधा'18 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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