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'अपने विचारों पर अडिग रहना चाहिए' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूर्व उपप्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा 'माई कंट्री, माई लाइफ़' का विमोचन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दिल्ली में किया. विमोचन के बाद बीबीसी के भारत संपादक संजीव श्रीवास्तव ने प्रधानमंत्री पद के लिए राजग के घोषित आडवाणी के निवास पर उनकी आत्मकथा के बारे में विस्तार से बातें की. बहुत कम होता है कि सक्रिय राजनीति में रहते लोग अपनी आत्मकथा लिखें. वे इससे बचते हैं. आपने क्यों तय किया कि आप आत्मकथा लिखेंगे? आप जिसे दुर्लभ बताकर मुझे क्रेडिट दे रहे हैं, उसका पूरा हक़दार मैं नहीं हूँ. मेरी पत्नी कमला और मेरी बेटी प्रतिभा नहीं होतीं और उनका जोर नहीं होता तो ये किताब नहीं लिखी जाती. हाँ, इतना ज़रूर है कि वर्ष 2007 के नवंबर महीने में मुझे लगा कि अब मैं जीवन के अस्सी साल पूरे करूँगा. कराची में वर्ष 1927 में पैदा हुआ था. परिवार का आग्रह रहा, बहुत अनुभव हुए हैं जीवन में, राजनीति के काफ़ी उतार-चढ़ाव भी देखे हैं तो उनके बारे में देशवासियों को भागीदार बनाना अच्छा ही रहेगा. कभी कभी पत्र-पत्रिकाओं में लिखता था लेकिन वर्षों से नहीं लिखा. तो मुझे लगा कि इसके ज़रिए लिखने का संतोष भी मिलेगा. लिखे तो सीधे हज़ार पन्ने लिख दिए. वर्षों का हिसाब आपने पत्रकारों से चुकता कर लिया! अस्सी साल के जीवन को अगर हज़ार पन्नों में लिखा है तो वह बहुत ज्यादा नहीं है. मेरा विचार और पुख़्ता हुआ जब मैंने 15 अगस्त को टीवी चैनल देखे और अख़बार-पत्रिकाएँ देखीं जिनमें आज़ाद भारत की साठ साल की प्रमुख घटनाओं का विवरण था. मैं जैसे-जैसे यहाँ तक पहुँचा हूँ, चाहे वह भारत का विभाजन हो, संविधान का निर्माण हो, पहला आम चुनाव हो या आगे चलकर जयप्रकाश नारायण का आंदोलन हो या आपातकाल हो या अयोध्या आंदोलन हो.... आपने जब ये किताब लिखी तब आप काफ़ी हद तक फ़ुर्सत में थे. कई लोगों ने आपके राजनीतिक अंत की बातें करनी शुरू कर दी थीं. अब एक साल बाद आप सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता हैं, चुनाव की तैयारी में हैं और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. एक साल में क्या हुआ, ये कैसी विडंबना है? नहीं, कोई विडंबना नहीं है. जिन लोगों ने इसे मेरा अंत समझ लिया था वो यही समझ रहे थे कि पार्टी ने मुझे दरकिनार कर दिया है मगर ऐसा था नहीं. पार्टी ने एक स्वर में कहा कि मैं ही उनका नेता हूँ तो उन्हें भी मानना पड़ा. तो ऐसा क्या हो गया. आडवाणी जी वही हैं, घर वही है, बीवी-बच्चे वही हैं, आपकी सोच भी वही है, आपने कोई विचार भी नहीं बदले तो फिर एक साल में ऐसा क्या हो गया? मुख्य रूप से मैं यही कहता हूँ कि अगर व्यक्ति का कोई विचार है तो उसे उस पर अडिग रहना चाहिए. उसमें कोई फेरबदल नहीं होना चाहिए. मैंने यही कोशिश की है कि मैं ख़ुद के साथ सच्चा रहूँ और मेरे परिवार ने इसमें सचमुच मेरा बहुत साथ दिया है. पता नहीं, आप इस बात का कितना सही जवाब देंगे. लेकिन आप कह रहे हैं कि आपकी बात अंततः सही साबित हुई. आप अपने रुख़ पर कायम रहे. विरोधी चाहे कुछ भी कहते रहें, आपकी बात सही सिद्ध हुई. आपको क्यों लगता है कि मैं इसका सही जवाब नहीं दूँगा. पुस्तक में ही कई जगह मैंने भगवद्गीता का उल्लेख किया है. मैंने उस भाषण का भी ज़िक्र किया है जिसकी वजह से सारा विवाद खड़ा हुआ था. मैंने लिखा है कि संघ का मेरे जीवन पर बहुत गहरा असर रहा है. मैं 14 वर्ष की उम्र में संघ का स्वयंसेवक बना. हर सप्ताह रामकृष्ण मिशन के स्वामी रंगानाथानंद का भाषण भी सुनने जाता था, उसका भी प्रभाव पड़ा. वह प्रभाव आज तक है. मैंने यही सीखा कि अपना काम अच्छी तरह करें, प्रामाणिकता से करें और परिणाम की चिंता छोड़ दें. आप ख़ुद को अर्जुन की तरह देखते हैं या कृष्ण की तरह? जो भी गीता में विश्वास रखता है और कृष्ण की भक्ति करता है, वह इसको मानेगा. एक और ज़िक्र है आपकी किताब में. नरेंद्र मोदी के बारे में. आप हमेशा नरेंद्र मोदी के साथ खड़े रहे, उनके अच्छे और बुरे वक़्त में. आपने उनका हमेशा साथ दिया. यहाँ तक कि जब वाजपेयी जी भी मानने लगे थे कि मोदी को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. नरेंद्र मोदी एक विवादास्पद व्यक्ति तो हैं ही. मोदी की तरफ़ से बार-बार पक्ष रखना आपको कैसा लगता है? लोग मानते हैं, मैं नहीं मानता हूँ और वाजपेयी जी भी उन्हें ज़िम्मेदार नहीं मानते थे. उन्हें लगता था कि मोदी अगर सामूहिक ज़िम्मेदारी के आधार पर इस्तीफ़ा दे देते तो अच्छा होता. मैंने वाजपेयी जी से कहा कि मैं इस बारे में उनसे बात करूँगा. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अपना इस्तीफ़ा किया लेकिन राष्ट्रीय परिषद ने उसे स्वीकार करने से मना कर दिया. जो आने वाले चुनाव हैं, अगर वे अनुभवी आडवाणी और युवा राहुल गांधी के बीच हो जाएँ, जैसा कुछ लोग सोच भी रहे हैं तो उसका परिणाम क्या होगा? अच्छा होगा, बुरा होगा या कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा? कुछ लोग ऐसा सोचते होंगे. मैं नहीं जानता कि क्या होगा लेकिन यह महत्वपूर्ण ज़रूर होता है कि नेतृत्व कौन कर रहा है. जनता यह देख चुकी है कि एनडीए का छह साल का शासन कैसा था और यूपीए का भी चार साल पूरा हो चुका है. कुछ समय बाद पाँच साल पूरे हो जाएँगे. जब लोग दोनों की तुलना करेंगे तो मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे एनडीए की सरकार को ही दोबारा लाएँगे. |
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