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तेज़ रफ़्तार रेलगाड़ियाँ चलाने पर विचार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में तेज़ रफ़्तार रेलगाड़ियाँ चलाने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार हो रहा है और संभावना है कि रेल मंत्री अपने बजट में इससे संबंधित घोषणा कर सकते हैं. फिलहाल सिर्फ़ दिल्ली से मथुरा के बीच आंशिक रुप से हाई स्पीड कॉरिडोर चालू है जिस पर लगभग 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से भोपाल शताब्दी रेलगाड़ी चलती है. भारत में हाई स्पीड कॉरिडोर बनाने की कोशिश दो दशक पुरानी है लेकिन आर्थिक और सुरक्षा कारणों से पहले बनी योजनाओं पर अमल नहीं हो सका. ताज़ा प्रगति ये हुई है कि आठ राज्यों, आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने हाई स्पीड कॉरिडोर बनाने के लिए ज़रुरी अध्ययन रिपोर्ट तैयार कराने की पेशकश की है. ये राज्य इस पर होने वाले खर्च में आधा हिस्सा देने के लिए तैयार हो गए हैं. बाकी आधा हिस्सा रेलवे वहन करेगी. रेल विकास निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव 26 फरवरी को रेल बजट में इसकी घोषणा कर सकते हैं. प्रस्ताव महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई-अहमदाबाद, मुंबई-नासिक, मुंबई-पुणे और पुणे-नासिक के बीच तेज़ रफ़्तार रेलगाड़ी चलाने का प्रस्ताव दिया है. मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड कॉरिडोर के लिए गुजरात सरकार ने भी प्रस्ताव दिया है. हरियाणा और पंजाब सरकार ने दिल्ली से चंडीगढ़ के बीच ऐसे ट्रैक बनाने का प्रस्ताव दिया है. हाई स्पीड कॉरिडोर पर दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ़्तार से रेलगाड़ियाँ चल सकती हैं. रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अशोक भटनागर बताते हैं कि सबसे पहले तत्कालीन रेल मंत्री माधव राव सिंधिया ने 1987-88 में दिल्ली-कानपुर के बीच तेज़ रफ़्तार रेलागड़ी चलाने के लिए एक फ़्रांसीसी विशेषज्ञ से अध्ययन कराया.
वो कहते हैं, इसके दो साल बाद ही जापान ने रुचि दिखाई और एक और अध्ययन हुआ लेकिन जब इस पर अमल करने की बात आई तो कई तरह की मुश्किलें खड़ी हो गईं. रेल मामलों के जानकार अरविंद घोष बताते हैं, "ख़ुद लालू प्रसाद यादव ने नवंबर 2005 में दिल्ली-पटना- कोलकाता के बीच अलग रेलवे ट्रैक बनाने की घोषणा की थी और इस पर डेढ़ सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से रेलगाड़ियाँ चलाने का प्रस्ताव था. ये वर्ष 2007 तक तैयार होना था लेकिन कुछ नहीं हो सका." लालू यादव ने मालगाड़ियों के लिए अलग ट्रैक बनाने पर ध्यान केंद्रित किया. इसके पीछे एक कारण ये भी था कि माल ढुलाई से रेलवे को ज़्यादा आय होती है. लेकिन राज्य सरकारों के आगे आने के बाद रेलवे ने फिर से यात्री गाड़ियों की रफ़्तार बढ़ाने की ओर ध्यान देना शुरू किया है. मुश्किलें और फ़ायदे अरविंद घोष बताते हैं कि हाई स्पीड कॉरिडोर बनाने पर प्रति किलोमीटर लगभग 300 करोड़ रूपए का खर्च आएगा जो बहुत अधिक है.
इसके अलावा पूरे कॉरिडोर पर कहीं भी रेलवे क्रॉसिंग नहीं होनी चाहिए. रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अशोक भटनागर कहते हैं, "हाई स्पीड कॉरिडर के ट्रैक के दोनों ओर ऐसी दीवार बनानी पड़ेगी जिससे ध्वनि प्रदूषण नहीं हो. यहां तो कब कोई आदमी मवेशियों के साथ ट्रैक पार करने लगे कहना मुश्किल है और ऐसे में बड़ी दुर्घटना हो सकती है." उनकी राय में अगर फिर से हाई स्पीड कॉरिडोर की बात आगे बढ़ती भी है तो उसे ज़मीन पर उतारना आसान नहीं होगा क्योंकि उसका किराया भी काफी अधिक होगा. हालाँकि इस तरह के कॉरिडोर से रेलयात्री काफी कम समय में यात्रा पूरी कर सकेंगे. इसके पीछे एक तर्क ये भी है कि आज़ादी के बाद से अब तक भारतीय रेल की औसत रफ़्तार में कोई ख़ास वृद्धि नहीं हुई है. अरविंद घोष कहते हैं, "ब्रिटिश शासन में रेलगाड़ियों की अधिकतम रफ़्तार सीमा 96 किलोमीटर प्रति घंटे थी. आज़ादी के बाद वर्ष 1967 से इसे बढ़ाकर सौ किलोमीटर प्रति घंटे किया गया. बाद में सिर्फ़ शताब्दी और राजधानी एक्सप्रेस के लिए रफ़्तार की सीमा बढ़ाई गई." |
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