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गुरुवार, 14 फ़रवरी, 2008 को 09:24 GMT तक के समाचार
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मायावती की नज़र दिल्ली पर

मायावती
मायावती की लोकप्रियता पिछले चुनाव के बाद उच्च वर्गों में भी बढ़ी है
चुनाव पूर्व सारे अनुमानों को झुठलाते हुए वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री बनीं मायावती की नज़रें अब दिल्ली की सत्ता पर टिकी हैं.

इसे स्वीकार करने में उन्हें कोई हिचकिचाहट भी नहीं है. वह कहती हैं, "मेरा आख़िरी पड़ाव दिल्ली है."

लेकिन सवाल है कि मायावती के लिए दिल्ली की डगर कितनी आसान है या फिर कितनी मुश्किल?

नई रणनीति

पिछले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चौराहों पर इश्तहारों के बड़े-बड़े बोर्ड नज़र आने लगे हैं. इन इश्तहारों में मायावती का हँसता हुआ चेहरा दिखाई पड़ता है.

बोर्ड पर लिखा है - "हमारी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकार अन्य पार्टी की सरकारों से अलग है. जहाँ अन्य पार्टियाँ सिर्फ़ वादे करती हैं, हम जो कहते हैं उन पर अमल भी करते हैं."

 ज्यादातर राज्यों में 20 से 25 प्रतिशत दलित हैं. यदि मायावती को उनका पूरा सहयोग मिलता है तो उन्हें एक बड़ी सफलता मिलेगी
शरत प्रधान, वरिष्ठ पत्रकार

इन इश्तहारों में सरकार की पिछले छह महीनों की उपलब्धियों के ब्यौरे भी दर्ज हैं.

मायावती तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं लेकिन पूर्ण बहुमत के अभाव में उनकी सरकार कभी भी पाँच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई.

अपनी राजनीति के शुरूआती दौर में मायावती ने सवर्णों के प्रति काफ़ी तीख़ा रूख़ अपनाया था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनकी नीति बदली है और अब वो सवर्णों के वोट को लुभाने की कोशिश में दिखती हैं. जिसका उन्हें फ़ायदा भी मिला है और पिछले चुनाव में उन्होंने पूर्ण बहुमत हासिल की थी.

जिस रणनीति के बल पर मायावती उत्तरप्रदेश में चुनाव जीतने में सफल रहीं उसे वो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में पूरे देश में आज़माना चाहती हैं.

लखनऊ में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, "ज्यादातर राज्यों में 20 से 25 प्रतिशत दलित हैं. यदि मायावती को उनका पूरा सहयोग मिलता है तो उन्हें एक बड़ी सफलता मिलेगी."

केक काटती मायावती
मायावती ने हाल ही में अपना जन्मदिन मनाया है

भारत में जहाँ नेताओं की औसत उम्र 70 से 80 साल है, वहाँ 52 वर्ष की उम्र में मायावती 'युवा' और ऊर्जावान हैं, यह बात भी उनके पक्ष में जाता है.

बदलता जीवन-यापन

भले ही दलित परिवार में जन्मी मायावती का बचपन बिना किसी शानो-शौकत के, साधारण ढंग से बीता हो लेकिन अब उनकी संपत्ति और जीवन यापन के ढंग पर सवाल उठने लगे हैं.

पिछले चुनाव से पहले सार्वजनिक तौर पर उन्होंने अपनी संपत्ति क़रीब 55 करोड़ रुपए बताई थी.

मायावती की बढ़ती हुई संपत्ति के बारे में उनके अधिकारियों का कहना है कि उनके समर्थकों के उपहार स्वरूप ये संपत्ति मिली है.

लेकिन इस व्याख्या से बहुत लोग सहमत नहीं हैं. मायावती पर कई बार भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं.

पिछली बार जब वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थी तब उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने ताज महल के नज़दीक एक कॉरिडोर बनाने की मंज़ूरी दी थी और पूरे मामले में कोई धाँधली हुई. लेकिन मायावती ने इसका खंडन किया था.

 हीरे-जवाहरात से उनके समर्थकों में एक संदेश जाता है कि यदि वह वहाँ तक पहुँच सकती हैं तो उनके जैसा कोई भी व्यक्ति धन और सफलता हासिल कर सकता है
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान

मायावती के जन्मदिन भी काफ़ी चर्चा में रहे हैं. मीडिया में महँगे हीरे-जवाहरात पहने 'जन्मदिन का केक' काटने की आलोचना भी ख़ूब हुई थी .

लेकिन प्रधान कहते हैं कि मायावती को वोट देने वाले इन हीरे-जवाहरात को पसंद करते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का कहना है, "हीरे-जवाहरात से उनके समर्थकों में एक संदेश जाता है कि यदि वह वहाँ तक पहुँच सकती हैं तो उनके जैसा कोई भी व्यक्ति धन और सफलता हासिल कर सकता है."

बढ़ती राजनीतिक हैसियत

बसपा की एक रैली
दलित और पिछडे तबके के लोग मायावती के वोट बैंक हैं

मायावती ने कहा कि उनके जन्मदिन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी की प्रमुख सोनिया गाँधी ने उन्हें जन्म दिन की बधाई दी थी.

यह निस्संदेह उनकी ऊँची होती राजनीतिक हैसियत का सबूत है. मायावती की पार्टी बसपा ने केंद्र में सरकार का भले ही समर्थन किया हो लेकिन सरकार की आलोचना से भी वह नहीं चूकती हैं.

जब वह केंद्र सरकार से राज्य के लिए 80 हज़ार करोड़ रुपए की विशेष सहायता राशि की माँग करती हैं तो उनके पिछड़े, दलित और ग्रामीण इलाक़ों के समर्थक उनकी इस पहल का स्वागत करते हैं.

 साठ सालों की उपेक्षा को एक साल में नहीं सुधारा जा सकता है
उत्तर प्रदेश के एक अधिकारी

लेकिन उत्तर प्रदेश में सरकार चलाना कोई आसान काम नहीं है. यह देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है. राज्य में अपराध की दर ऊँची काफ़ी है, स्वास्थ्य सेवाएँ बदहाल है और अशिक्षा का स्तर काफ़ी ऊँचा है.

इसके बारे में उनके अधिकारियों का कहना है, "साठ सालों की उपेक्षा को एक साल में नहीं सुधारा जा सकता है".

अब राज्य में सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

प्रतिमा प्रेम

 जब महात्मा गाँधी के लिए मेमोरियल बनाया जाता है या कांग्रेस पार्टी जब नेहरू-गाँधी वंश के लोगों की प्रतिमाएँ लगाती है तब क्यों नहीं कोई सवाल पूछता है?
मायावती के एक क़रीबी अधिकारी

दलित नेताओं और ख़ुद अपनी प्रतिमाओं से प्रेम की वजह से भी मायावती चर्चा में हैं. लखनऊ में जाने-माने मूर्तिकार श्रवण प्रजापति ने मायावती की छोटी-बडी सात प्रतिमाओं को बनाया है.

इस बारे में पूछने पर मायावती के नज़दीक माने-जाने वाले एक सरकारी अधिकारी पलट कर सवाल पूछते हैं, "जब महात्मा गाँधी के लिए मेमोरियल बनाया जाता है या कांग्रेस पार्टी जब नेहरू-गाँधी वंश के लोगों की प्रतिमाएँ लगाती है तब क्यों नहीं कोई सवाल पूछता है?"

जहाँ कुछ लोगों का कहना है कि मेमोरियल बनाकर और प्रतिमाएँ लगवा कर मायावती अपनी भावनात्मक जरूरतों को पूरा कर रही है.

वहीं कुछ लोगों को यह उत्तर संतुष्ट नहीं कर पाता है. लखनऊ में टैक्सी चालक आर एन शर्मा पूछते हैं, "जब राज्य में लोग भूख से मर रहे हों तो कैसे कोई मुख्यमंत्री इतनी बड़ी रकम मेमोरियल और पार्क बनाने में ख़र्च कर सकता है."

लोकप्रिय नेता

मजूदर
उत्तर प्रदेश में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है

मायावती के ज्यादातर समर्थक गाँवों के ग़रीब लोग हैं जो मीडिया से प्रभावित नहीं होते. इन आलोचनाओं से बेख़बर मायावती इनके लिए लोकप्रिय नेता है.

लखनऊ में जो इश्तहार लगे हैं उसे कार से चलने वाले लोग भले ना पढ़ें लेकिन साइकिल सवार या पैदल चलने वाली जनता की निगाहें इन पर ज़रूर जाएगी.

 जब राज्य में लोग भूख से मर रहे हों तो कैसे कोई मुख्यमंत्री इतनी बड़ी रक़म मेमोरियल और पार्क बनाने में ख़र्च कर सकता है
आर एन शर्मा, टैक्सी चालक

और इन्हीं दलित, ग़रीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोगों पर मायावती का विश्वास है जो उन्हें प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुँचा सकते हैं.

शरत प्रधान कहते हैं, "यदि वो कोई बड़ी ग़लती नहीं करतीं तो उन्हें कोई नहीं रोक सकता. उन्हें लोगों तक पहुँचना होगा साथ ही मीडिया के साथ मधुर संबंध बनाने होंगें."

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