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'निजी मामलों पर जनहित याचिका नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक दिशा-निर्देश जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि किस मामले पर जनहित याचिका (पीआईएल) सुनी जा सकती है और किस मामले पर ऐसा नहीं हो सकता. निजी या व्यक्तिगत विवाद के मामलों को जनहित याचिका के दायरे से बाहर निकाल दिया गया है. माना जा रहा है कि जनहित याचिकाओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि पर लगाम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह क़दम उठाया है. अदालत ने जिस तरह के मामलों को जनहित याचिका के तौर पर नहीं सुनने का निर्णय लिया है उनमें ज़्यादातर मामले व्यक्तिगत क़िस्म के हैं. न्यायालय का पीआईएल सेल इन दिशा-निर्देशों के आधार पर याचिकाओं की छँटनी करके उचित मामलों को न्यायाधीश के सामने रखेगा. 'दाख़िला में दख़ल नहीं..'
उच्चतम न्यायालय से जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार भू-स्वामी और किराएदार के झगड़ों को कोर्ट पीआईएल के तौर पर नहीं निबटाएगी. मेडिकल कॉलेजों या दूसरे शिक्षण संस्थानों में दाख़िला को लेकर भी किसी तरह के मामले अब जनहित याचिका नहीं माने जाएँगे. नियोक्ता के साथ सेवा को लेकर विवाद, पेंशन और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सहायता के मामले भी इस श्रेणी से बाहर हो गए हैं. कोर्ट ने यह भी साफ़ किया है कि केंद्र या राज्य सरकार और स्थानीय निकायों के ख़िलाफ़ सभी तरह की शिकायतों की सुनवाई इस दायरे में नहीं की जा सकेगी. सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों को भी जनहित याचिका के तहत सुनने से इनकार कर दिया है जिनमें उच्च न्यायालय या निचली अदालतों में मुक़दमे की सुनवाई पहले कराने की अपील की जाती है. बच्चों, पत्नी या माँ-बाप को गुज़ारे की रक़म के लिए अपराध संहिता की संबंधित धारा के तहत मामला दायर करने या सक्षम न्यायालयों का दरवाज़ा खटखटाने कहा गया है. 'जनहित के मामले'
सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में दिसंबर महीने की पहली तारीख़ को कोर्ट की संपूर्ण पीठ के फ़ैसले को आधार बनाते हुए ये दिशा-निर्देश तैयार किए हैं. दिशा-निर्देश तैयार करने में शीर्ष अदालत के बाद के फैसलों का भी ख़्याल रखा गया है. कोर्ट ने जनहित याचिकाओं के तहत सुनवाई के लिए दस तरह के मामलों को चिह्नित किया है. बँधुआ मज़दूरी, बेसहारा बच्चे, न्यूनतम मज़दूरी नहीं मिलना, अनियमित तौर पर काम करने वाले मज़दूरों का शोषण और श्रम क़ानूनों का उल्लंघन ऐसे मामले हैं जिन्हें अदालत जनहित याचिका के तहत सुनेगी. सुप्रीम कोर्ट जेल में चौदह साल बिताने के बाद रिहाई की अपील, जेल में उत्पीड़न, मौत जैसी शिकायतों पर जनहित याचिका के तौर पर गौर करेगा. उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई
प्राथमिकी दर्ज करने में पुलिस की आनाकानी, पुलिस उत्पीड़न और हिरासत में मौत के मामले भी पीआईएल के तहत सुने जाएँगे. महिला उत्पीड़न की शिकायतें जनहित याचिका के दायरे में रखी गई हैं. बलात्कार, हत्या और अपहरण के अलावा दहेज उत्पीड़न और पत्नी को जलाने के मामले इसमें शामिल हैं. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके के लोगों के उत्पीड़न को भी अदालत इस दायरे में सुनने को तैयार है. दंगा पीड़ितों की अपील और पारिवारिक पेंशन की माँग करने वाली याचिकाएँ भी पीआईएल के लायक मानी गई हैं. कोर्ट ने प्रदूषण, पारिस्थितिकी में गड़बड़ी, मादक पदार्थ, खाद्य सामग्री में मिलावट के अलावा सांस्कृतिक जगह, प्रचीन धरोहर, जंगल, जंगली जानवर की देखभाल और आम लोगों के व्यापक हित के मामलों को जनहित याचिका के तहत सुनने का रास्ता खुला रखा है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'लड़कों की शादी की उम्र 18 वर्ष हो'06 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस 'शादी के बाद उपहार की माँग दहेज नहीं'01 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस नहीं लगेगा कोलकाता का पुस्तक मेला30 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस जनहित याचिकाओं पर दिशा-निर्देश14 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस नंदीग्राम कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की रोक13 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'विवाह पंजीकरण सभी के लिए अनिवार्य'25 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस सुप्रीम कोर्ट ने बंद पर रोक लगाई30 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस बिहार के मसले पर जनहित याचिका30 मई, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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