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जनहित याचिकाओं पर दिशा-निर्देश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह न्यायिक सक्रियता के तहत न्यायालयों में दायर की जाने वाली जनहित याचिकाओं यानी पीआईएल को स्वीकार करने और उन पर सुनवाई करने के बारे में कुछ मानदंड और दिशा-निर्देश बनाने पर विचार कर रहा है. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा है, "जनहित याचिकाओं को स्वीकार करने और उन पर सुनवाई करने के बारे में दिशा-निर्देश तय करना एक बेहतर क़दम होगा." खंडपीठ ने कहा है कि वह न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा की अध्यक्षता वाली एक अन्य खंडपीठ के उठाए इन सवालों पर भी विचार करेगा जो एक जनहित याचिका को मुख्य न्यायाधीश को भेजते हुए उठाए गए हैं. न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा वाली खंडपीठ ने दो न्यायाधीशों वाली एक अन्य खंडपीठ की टिप्पणियों का हवाला देते हुए एक जनहित याचिका मुख्य न्यायाधीश को भेज दी थी. न्यायमूर्ति एके माथुर और मार्कंडेय काटजू वाली खंडपीठ ने कहा था कि अतीत में सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिकाओं को स्वीकार करने के अपने क्षेत्राधिकार को पार कर लिया है. इन टिप्पणियों के मद्देनज़र न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपने सामने आई एक जनहित याचिक को मुख्य न्यायाधीश को बढ़ा दिया था. न्यायमूर्ति सिन्हा ने कहा था कि हाल की इन टिप्पणियों के संबंध में यह स्पष्ट नहीं है कि जनहित याचिकाओं के बारे में सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार और अधिकार क्या हैं. मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने गुरूवार को कहा था कि सुप्रीम कोर्ट न्यायपालिका की सक्रियता पर हाल में की गई दो जजों की पीठ की टिप्पणी से बँधा नहीं है. ग़ौरतलब है कि इसी सप्ताह सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एके माथुर और मार्कंडेय काटजू की पीठ ने कहा था कि न्यायपालिका की सक्रियता के नाम पर कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करना असंवैधानिक है. दो सदस्यीय पीठ ने आगे कहा था, ''संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की ज़िम्मेदारी स्पष्ट है. अगर क़ानून है तो जज उसे लागू करा सकते हैं लेकिन जज क़ानून बना कर उसे लागू नहीं करा सकते.'' उत्तर प्रदेश के वृंदावन की विधवाओं के पुनर्वास के लिए एक स्वयंसेवी संस्था की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ कहा,'' हम दो न्यायाधीशों की टिप्पणी से बँधे नहीं हैं.'' मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी उस समय की जब याचिकाकर्ता ने कहा कि न्यायपालिका की सक्रियता पर हाल में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अदालतें जनहित याचिकाएं स्वीकार करने से मना कर रही हैं. वृंदावन की विधवाओं के पुनर्वास के लिए दायर जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'अदालतें सीमाओं का अतिक्रमण न करें'10 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस न्यायिक परिषद के गठन पर विवाद25 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस न्यायपालिका सीमा में रहे: प्रधानमंत्री08 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस न्यायपालिका बनाम विधायिका की बहस13 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस विधायिका-न्यायपालिका में टकराव बढ़ेगा?11 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'सांसदों पर कोर्ट को अधिकार नहीं'08 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'आदेशों से संतुलन बिगड़ने का ख़तरा'20 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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