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'सांसदों पर कोर्ट को अधिकार नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोकसभा के अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कहा है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में संसद से बर्ख़ास्त किए गए सांसदों के मामले में अदालतों को कोई अधिकार नहीं है. उन्होंने साफ़ कहा है कि यदि अदालत से इस मामले में आए कोई नोटिस का जवाब नहीं दिया जाएगा. उल्लेखनीय है कि संसद में प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने के आरोपो में 11 सांसदों को संसद से निष्कासित कर दिया गया था. इसके बाद कुछ सांसदों ने इस दलील के साथ अदालत की शरण ली है कि उन्हें प्राकृतिक न्याय के तहत अपनी सफ़ाई का मौक़ा नहीं मिला. बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया हैं कि सांसदों को निष्कासित करने का फ़ैसला जल्दबाज़ी में लिया गया और यह मामला विशेषाधिकार समिति या आचरण समिति को दिया जाना चाहिए था. उन्होंने कहा कि इस मामले में विशेषाधिकार का कोई हनन नहीं हुआ है. लोकसभाध्यक्ष ने कहा, "मैं किसी को अदालत जाने से रोक तो नहीं सकता लेकिन मैं मानता हूँ कि यह मामला न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और अदालत का कोई आदेश संसद के लिए बाध्यकारी नहीं है."
अदालत के प्रति सम्मान दोहराते हुए उन्होंने कहा, "यह अनुशासन और आचरण का मामला था और आख़िरकार संसद को तय करना है कि अनुशासनहीनता पर वह अपने सदस्यों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई करेगी." समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए गए एक विशेष साक्षात्कार में लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि इस मामले में उन्होंने सैकड़ों पत्र और ईमेल मिले हैं जिसमें संसद में की गई कार्रवाई की तारीफ़ की गई है. हालाँकि उन्होंने इस बात को बेबुनियाद बताया कि कम वेतन और भत्ते मिलने की वजह से सांसदों को भ्रष्टाचार का रास्ता अपनाना पड़ा लेकिन उन्होंने कहा कि यदि सरकार सांसदों के वेतन-भत्तों को लेकर कोई विधेयक लेकर आती है तो वे इसे लेकर उत्सुक रहेंगे. लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने अपनी ओर से सरकार को वेतन और भत्तों के निर्धारण के लिए एक आयोग के गठन का सुझाव दिया है क्योंकि उनकी राय में सांसदों को अपने वेतन का निर्णय ख़ुद नहीं करना चाहिए. | इससे जुड़ी ख़बरें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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