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शनिवार, 25 अगस्त, 2007 को 07:05 GMT तक के समाचार
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न्यायिक परिषद के गठन पर विवाद

सुप्रीम कोर्ट
न्यायपालिका में पारदर्शिता की ज़रूरत को देखते हुए जजेज इन्कवायरी बिल 2006 संसद में पेश किया गया था
भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों पर लगने वाले आरोपों की जाँच के लिए प्रस्तावित न्यायिक परिषद में न्यायपालिका से बाहर के लोगों को भी शामिल किए जाने समेत कई अन्य मुद्दों पर बहस तेज़ हो गई है.

न्यायपालिका में पारदर्शिता के लिए वर्ष 2006 में 'जजेज़ इन्क्वायरी बिल' संसद में पेश किया गया था. इस पर 26 सांसदों की स्थायी समिति ने गत 17 अगस्त को अपने कई सुझाव दिए हैं.

समिति ने अपने सुझावों में कहा कि न्यायाधीशों पर लगे आरोपों की जाँच सिर्फ़ न्यायाधीश ही न करें, बल्कि़ इसमें कार्यपालिका और विधायिका के प्रतिनिधि भी शामिल किए जाएँ.

समिति का यह भी प्रस्ताव है कि जजों की नियुक्तियों में बाहरी लोगों का दख़ल हो.

सुझावों पर मतभेद

हालाँकि सरकार की राय भी इसके उलट है जिसमें कहा गया है कि केवल न्यायिक प्रृष्ठभूमि के लोगों को ही न्यायाधीशों से संबंधित मामलों की जाँच करनी चाहिए.

 जो भी संस्था जजों पर लगे आरोपों की जाँच करे उसमें सिर्फ़ न्यायपालिका के लोगों को ही होना चाहिए क्योंकि वह इस काम के माहिर होते हैं
जेएस वर्मा, पूर्व मुख्य न्यायाधीश

समिति के सुझावों के पक्षधर लोगों का सवाल है कि देश में क्या जजों को छोड़कर कोई ईमानदार नहीं है, तो वहीं इन सुझावों से असहमत लोगों ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अतिक्रमण बताया.

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा कहते हैं, “जो भी संस्था जजों पर लगे आरोपों की जाँच करे उसमें सिर्फ़ न्यायपालिका के लोगों को ही होना चाहिए क्योंकि वह इस काम के माहिर होते हैं.”

जस्टिस वर्मा से सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे का कहना है "जजों के ख़िलाफ़ जाँच में न्यायपालिका से बाहर के लोगों के होने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है."

 जजों के ख़िलाफ़ जाँच में न्यायपालिका से बाहर के लोगों के होने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है.
हरीश साल्वे, सुप्रीम कोर्ट के वकील

इसके उलट सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पीबी सावंत कहते हैं “आज लोगों में यह धारणा है कि क्योंकि जज ही जजों के ख़िलाफ़ जाँच करते हैं इसलिए हमें न्याय नहीं मिल सकता”.

सावंत का मानना है “जजों के ऊपर लगे आरोपों की जाँच करने के लिए कोई निष्पक्ष संस्था होनी चाहिए और ऐसा तभी हो सकता है जब जाँच में न्यायपालिका से बाहर के लोग भी शामिल हों”.

राजनीति का दखल

आज़ाद भारत के इतिहास में किसी जज के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न होने के सवाल के जबाब में साल्वे कहते हैं कि एक बार जब संसद में पूर्व जज वी रामास्वामी के ख़िलाफ़ 1991 में महाभियोग चलाया गया था तो वह भी संसद में उत्तर-दक्षिण की राजनीति का शिकार हो गया था.

 जजों के ऊपर लगे आरोपों की जाँच करने के लिए कोई निष्पक्ष संस्था होनी चाहिए, और ऐसा तभी हो सकता है जब जांच में न्यायपालिका से बाहर के लोग भी शामिल हों
पीबी सावंत, पूर्व मुख्य न्यायाधीश

गौरतलब है कि वी रामास्वामी एकमात्र ऐसे जज थे जिनके खिलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था. 108 सांसदों की शिक़ायत के बाद एक जांच में जस्टिस रामास्वामी को हरियाणा और पंजाब हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग करने का दोषी पाया था.

हालाँकि उन्होंने बाद में नौकरी से इस्तीफ़ा दें दिया पर संसद उन्हें नही हटा सकी थी क्योंकि केवल 196 सांसदों ने उन्हें हटाने के लिए मत दिया जो की निर्धारित दो तिहाई की संख्या से कम था.

साल्वे मानते हैं कि महाभियोग की पूरी प्रक्रिया ही असरहीन है पर वह यह भी कहते हैं कि मौजूदा हालात इस बात के लायक नहीं कि बाहरी लोग जजों की जाँच करें.

हालाँकि सरकार पर संसद की इस स्थायी समिति की सिफारिशें मानने की कोई बाध्यता नहीं है पर इसके महत्व को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता.

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