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जजों को 'माइ लॉर्ड' कहने की ज़रूरत नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में अदालती कार्रवाई के दौरान जजों को अंग्रेज़ों के ज़माने से चली आ रही परंपरा के तहत 'माइ लॉर्ड' या 'माइ लॉर्डशिप' कहने की ज़रूरत नहीं होगी. बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अनुसार अब अदालतों में 'योअर ऑनर' या 'ऑनरेबल कोर्ट' का संबोधन ही काफ़ी होगा. वकील अदालत को 'सर' या इसके समतुल्य किसी क्षेत्रीय प्रचलन वाले शब्द से भी संबोधित कर सकेंगे. बार काउंसिल ने बुधवार को पारित एक प्रस्ताव में कहा है कि जजों को संबोधित करने के बारे में नई व्यवस्था उच्च न्यायलयों समेत हर स्तर की अदालतों में लागू होगी. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संबोधनों के बारे में किसी भी तरह के संशोधन का काम बार काउंसिल को करना चाहिए. भारत सरकार के गज़ट में प्रकाशन के साथ ही नई व्यवस्था लागू हो जाएगी. वकीलों ने इस क़दम का स्वागत किया है. एक वरिष्ठ क़ानूनविद सुभाष कश्यप ने कहा, "परंपरागत संबोधनों को बहुत पहले ही छोड़ दिया जाना चाहिए था." कश्यप का कहना है कि वकीलों के ड्रेस कोड में परिवर्तन करने का समय आ गया है. ग़ौरतलब है कि भारत में वकीलों को टाइ और काला कोट पहनना पड़ता है. इस तरह की पोशाक निचली अदालतों में भी अनिवार्य है जहाँ अक्सर गर्मी से निपटने के लिए एयरकंडीशनिंग की व्यवस्था नहीं होती. | इससे जुड़ी ख़बरें क़ानून जानने वाले अनोखे कार्यकर्ता13 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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