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हाई कोर्ट से बढ़ती ज़मानतों पर चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर बहुत गंभीर चिंता से लिया है कि बहुत से अभियुक्त ज़मानत के लिए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते हैं और उस दौरान जो समय मिलता है उसमें वे अपनी ताक़त और धन के बल पर गवाहों को तोड़ने की कोशिश करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाई कोर्ट अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अभियुक्तों को ज़मानत दे देते हैं जिससे यह चलन बढ़ता ही जा रहा है कि अभियुक्त हर किसी मामले में हाई कोर्ट तक पहुँच जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जीपी माथुर और एके माथुर की खंडपीठ ने शुक्रवार को एक फ़ैसले में कहा कि कोई अभियुक्त ज़मानत के लिए सीधे हाई कोर्ट का दरवाज़ा नहीं खटखटा सकता बल्कि उसे किसी भी तरह की राहत के लिए निचली अदालतों में ही अर्ज़ी देनी होगी. न्यायाधीश जीपी माथुर और एके माथुर की खंडपीठ ने कहा कि बहुत से ताक़तवर अभियुक्त अपने धन-बल का इस्तेमाल करके गवाहों को ख़रीदने की कोशिश करते हैं. खंडपीठ ने कहा, “उच्च न्यायालयों की कार्यसूची में बहुत से मामले लंबित हैं. न्यायाधीशों को अपना क़ीमती समय इन अपीलों की सुनवाई में लगाना चाहिए तभी न्याय का मक़सद पूरा होने में मदद मिलेगी.” सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी पर अधिवक्ता प्रशांत भूषण का कहना है, “इन टिप्पणियों से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ने वाला है. हमारी न्याय प्रणाली में व्यवस्थागत बदलाव की ज़रूरत है. आज कोर्ट की जवाबदेही तय नहीं है और न्यायाधीशों पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई भी नहीं की जा सकती.”
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरफ़ से हत्या के कुछ दोषियों को दी गई ज़मानत को रद्द करते हुए ये फ़ैसला सुनाया है. उत्तर प्रदेश की रहने वाली हमीदा ने राशिद नामक व्यक्ति और कुछ अन्य लोगों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उसके पति बल्ला पर घातक हथियारों से हमला किया था. यह घटना मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले की है. स्थानीय कोतवाली पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 324 (शारीरिक नुक़सान पहुँचाने), 352 (बल प्रयोग करने) और 506 (डराने-धमकाने) के तहत मामला दर्ज़ किया था, हालाँकि मुद्दई हमीदा ने शिकायत की थी कि अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मामला धारा 307 (हत्या की कोशिश) के तहत दर्ज किया जाए. कम गंभीर धाराएँ मुख्य न्याय दंडाधिकारी (सीजेएम) ने अभियुक्तों को ज़मानत दे दी थी क्योंकि इन धाराओं के तहत दर्ज किए गए मामलों में ज़मानत आसानी से मिल सकती है लेकिन सीजेएम ने ये साफ़तौर पर कहा कि अगर मामले को और अधिक गंभीर आपराधिक धाराओं के साथ पेश किया गया होता तो ज़मानत आसानी से नहीं मिलती. हमीदा के पति बल्ला की बाद में उन्हीं घावों की वजह से मौत हो गई जो अभियुक्तों के कथित हमले की वजह से बने थे और पुलिस ने मामले की धारा बदलकर 304 (निंदनीय नरहत्या जोकि तकनीकी तौर पर हत्या नहीं कहलाती) कर दी. अभियुक्तों ने सीजेएम की अदालत के बजाय इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और धारा 482 के तहत ज़मानत की अर्ज़ी दी, हालाँकि मामले की धारा बदलकर 304 हो चुकी थी. हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अभियुक्तों की ज़मानत जारी रहेगी.
उसके बाद मुद्दई हमीदा ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के ज़मानत फ़ैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सुध ली और आरोप लगाया कि अभियुक्तों ने न्यायिक प्रक्रिया का मखौल उड़ाया है. हमीदा की शिकायत से सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 439 के तहत किसी भी अभियुक्त को ज़मानत के लिए सबसे पहले उसी निचली अदालत से संपर्क करना चाहिए जहाँ पर मुक़दमा चला हो. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "इस मामले के अभियुक्तों ने जानबूझकर ऐसा नहीं किया और धारा 482 के तहत इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा दिया क्योंकि अगर वे धारा 439 के तहत निचली अदालत में ज़मानत अर्ज़ी देते तो उस अर्ज़ी पर सुनवाई तभी हो सकती है जब अभियुक्त न्यायिक हिरासत में हों." सर्वोच्च न्यायालय ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि इस मामले में अभियुक्त एक दिन भी पुलिस या न्यायिक हिरासत में नहीं रहे हैं और न ही उन्होंने ज़मानत के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायाधीश की अदालतों में अर्ज़ी दी. कोर्ट ने इन अभियुक्तों की ज़मानत रद्द करने का आदेश दिया और यह इजाज़त दी कि ये अभियुक्त अपनी ज़मानत के लिए नए सिरे से निचली अदालत में अर्ज़ी दे सकते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें क़ानून-व्यवस्था के लिए 'अनोखी' पहल22 जून, 2007 | भारत और पड़ोस मायावती, मिश्र के ख़िलाफ़ याचिका ख़ारिज13 जून, 2007 | भारत और पड़ोस आरक्षण का मामला संविधान पीठ को17 मई, 2007 | भारत और पड़ोस सुशील शर्मा की मौत की सज़ा पर रोक07 मई, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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