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शुक्रवार, 04 अगस्त, 2006 को 14:03 GMT तक के समाचार
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बलात्कार मुक़दमों के लिए महिला जज
बहुत सी महिलाएँ बलात्कार की घटनाओं की रिपोर्ट ही नहीं करती हैं
नए क़ानून के महिलाओं को हिम्मत मिलने की उम्मीद जताई गई है
भारत में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महिलाओं के साथ बलात्कार के मुक़दमों की सुनवाई सिर्फ़ महिला जजों से कराने के प्रावधान वाले एक विधेयक को मंज़ूरी दी है.

इस विधेयक को अगर संसद की मंज़ूरी मिल जाती है तो इससे आपराधिक दंड संहिता (सीपीसी) में बलात्कार संबंधी क़ानून में संशोधन हो जाएगा.

समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस विधेयक के बारे में कहा, "इससे एक अच्छी, असरदार और मानवीय न्याय प्रणाली" चलाने में मदद मिलेगी.

गत मई में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बलात्कार के मामलों में चिकित्सा सबूत अपर्याप्त भी हैं तो भी महिला का बयान ही काफ़ी समझा जाना चाहिए.

जज ने कहा था कि देश में बलात्कार के लगभग 80 प्रतिशत मामलों में सबूतों के अभाव, धीमी पुलिस जाँच में अभियुक्तों को सज़ा नहीं मिल पाती है. बहुत सी महिलाएँ ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट भी कराने से कतराती हैं.

उस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा था, "भारतीय महिलाओं में इस तरह की घटनाओं को छुपाने की प्रवृत्ति होती है क्योंकि इसमें उनका और उनके परिवार का सम्मान जुड़ा होता है."

अपराधों का ब्यौरा रखने वाले राष्ट्रीय ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2004 में बलात्कार की 18 हज़ार 100 से ज़्यादा घटनाएँ दर्ज की गई थीं.

इसके अलावा एक लाख 75 हज़ार घटनाएँ ऐसी हुई थीं जिनमें महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार किया गया.

सहानुभूति वाला माहौल

केंद्रीय विधि मंत्रालय के प्रवक्ता एसएम कुमार ने बताया कि मंत्रिमंडल ने इस विधेयक को गुरूवार को मंज़ूरी दी.

एशियाई महिलाएँ

भारत में महिला संगठन और मानवाधिकार गुट महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले यौन अपराधों से संबंधित क़ानून में ऐसा परिवर्तन करने की माँग कर रहे हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि सरकारी आँकड़ों के अनुसार भारत में हर 29वें मिनट पर एक महिला के साथ बलात्कार की घटना हो जाती है.

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित स्थान बताया जाता है जहाँ 30 प्रतिशत बलात्कार की घटनाएँ होती हैं.

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास का कहना था, "यह एक बहुत सकारात्मक क़दम है और इससे बलात्कार की शिकार महिलाओं को जल्दी न्याय मिलने में मदद मिलेगी."

"अभी तक ऐसा होता था कि पुरुष वकील बलात्कार की शिकार किसी महिला को डराने और धमकाने में कामयाब हो जाते थे, अब महिला जज सहानुभूति वाला माहौल बनाने में मदद करेंगी."

केंद्रीय विधि मंत्रालय के प्रवक्ता एसएम कुमार ने कहा कि नए विधेयक में अब यह भी प्रावधान होगा कि बलात्कार की शिकार कोई महिला अदालत में जिरह के दौरान अपने वकील को अपने साथ रख सकेगी. अभी तक ऐसा कैमरे के सामने होता था जिसमें असहजता होती थी.

प्रवक्ता ने कहा, "बलात्कार की शिकार महिला को वकील भी महिला ही देने का प्रावधान किया जा रहा है क्योंकि सिर्फ़ महिला ही एक महिला को सही तरह से समझ सकती है."

मंत्रिमंडल ने यह भी प्रस्ताव किया है कि अगर कोई महिला चाहे तो अपनी पसंद का वकील चुन सकती है. अभी तक सिर्फ़ सरकारी वकील ही ऐसे मामलों में जिरह करते हैं.

साथ ही ऐसे मामलों में गवाहों के बयान पुलिस के सामने देने की प्रथा भी बंद करने का प्रस्ताव किया गया है.

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