|
चिंताजनक है उत्तर भारत में स्त्री-पुरुष अनुपात | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यूँ तो भारत के दो प्रमुख उत्तरी राज्यों, पंजाब और हरियाणा में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से कम ही रही है मगर पिछले एक दशक के दौरान बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और आधुनिक तकनीक उपलब्ध हो जाने के बाद स्त्री-पुरुष अनुपात में फ़र्क अत्यंत चिंतानजक हो गया है. विशेषज्ञ मानते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम इन क्षेत्रों में यहीं के लोगों की वर्षों पुरानी पुरुष प्रधान मानसिकता और इससे जुड़े अन्य कारण लड़कियों की लगातार घटती हुई गिनती के लिए ज़िम्मेदार हैं. एक ताज़ा अनुमान के मुताबिक भारत में प्रति वर्ष ऐसे पाँच लाख भ्रूण मार दिए जाते हैं जो कि लड़कियों के होते हैं. देशभर में वर्ष 1994 के बाद ग़ैरक़ानूनी करार दी गई लिंग जाँच और कन्या भ्रूण हत्या अब भी चोरी-छिपे चल रही है और आंकड़े साफ़ दर्शाते हैं कि पंजाब और हरियाणा में यह समस्या अन्य राज्यों से कहीं बड़ी हैं. इस सुबों में न केवल स्त्री-पुरुष लिंग अनुपात की दरें देश भर में सबसे कम है बल्कि शिशु लिंग अनुपात जो कि आने वाली पीढ़ियों के बीच लिंग अनुपात तय करेगा की दरें और भी चिंताजनक हैं. वर्ष 2003 के आंकड़ों के अनुसार हरियाणा में प्रति हज़ार लड़कों के लिए 803 लड़कियाँ हैं और पंजाब में ये संख्या इससे भी कम केवल 776 रह गई है. पुरानी समस्या चंडीगढ़ स्थित इंस्टीट्यूट फ़ॉर डेवलपमेंट एंड कम्यूनिकेशन यानी आईडीसी के निदेशक प्रमोद कुमार बताते हैं कि उत्तर भारत में स्त्रियों की तादाद में कमी एक शताब्दी से भी पुरानी समस्या है. प्रमोद कुमार कहते हैं, "यह एक ऐतिहासिक समस्या है. अगर हम वर्ष 1901 के भी आँकड़े देखें तो उस समय भी इसी क्षेत्र में सबसे दबा हुआ लिंग अनुपात था. पंजाब के हर नौवें परिवार ने किसी न किसी समय कन्या भ्रूण हत्या को चुना है पर जिस तरह से इसकी समाज में स्वीकृति बढ़ रही है वह बहुत ही गंभीर बात है." आईडीसी की ओर से किए गए हाल के सर्वेक्षणों ने दर्शाया है कि भ्रूण हत्या बढ़े लिंग अनुपात का अकेला कारण नहीं है. पिछले कई वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रही रेणुका डागर बताती हैं, "अगर लिंग अनुपात किसी जगह कम है तो लिंग जाँच इसकी एक वजह हो सकती है पर साथ बलात्कार, शारीरिक शोषण या दहेज प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयाँ भी इन इलाकों में ज़्यादा हैं." विशेषज्ञों का मानना है कि जहाँ भ्रूण हत्या के लिंग का पता लगाने के तरीकों ने कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा दिया है वहीं यह भी सच है कि आधुनिक तकनीक ने वर्षों पुरानी इस समस्या को नई शक्ल दे दी है. कुछ वर्ष पूर्व सिखों के सबसे बड़े धार्मिक मंच अकाल तख्त ने कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ बाकायदा एक हुकुमनामा जारी कर इस पर अंकुश लगाने का प्रयास किया था. ठोस प्रयासों की ज़रूरत मगर प्रमोद कुमार कहते हैं कि भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ केवल धार्मिक हस्तक्षेप ही पर्याप्त नहीं है. वो कहते हैं, "किसी गाँव के परिवार में जाकर पूछें कि क्या बिना दहेज के शादी हुई है. पूछें कि कितने परिवार ऐसे हैं जहाँ पर औरतों से मारपीट नहीं होती तो शायद आपको कोई जवाब नहीं मिलेगा. औरतों की समस्याओं को निपटाने का प्रयास करना होगा."
पर महिलाओं की लगातार घट रही गिनती के बावजूद सरकारी अधिकारियों का दावा है कि स्थिति पर अब भी काबू पाया जा सकता है. कुछ ही रोज़ पहले प्रकाशित किए गए आँकड़ों का हवाला देते हुए हरियाणा सरकार के सचिव राजेश खुल्लर ने बताया कि सूबे के 17 में से 14 ज़िलों में सरकारी कोशिशों के फलस्वरूप स्त्री-पुरुष लिंग अनुपात में सुधार हुआ है. इसी तरह पंजाब के कुछ गाँवों में भी स्थिति बदलने के संकेत मिलने लगे हैं. मिसाल के तौर पर दोअबा क्षेत्र के लखनपाल गाँव में जन्म से छह वर्ष के बच्चों में प्रति 1000 लड़कों पर 1400 लड़कियाँ हैं. राजेश खुल्लर मानते हैं कि सख़्ती से लागू किए जा रहे क़ानून के साथ-साथ अब आम लोगों के एक बड़े वर्ग के बीच बिगड़े हुए स्त्री-पुरुष संतुलन के बारे में एहसास भी होने लगा है. आईडीसी निदेशक प्रमोद कुमार भी मानते हैं कि पंजाब और हरियाणा की सरकारें अब पहली बार इस वर्षों पुरानी समस्या पर कुछ गंभीरता जताने लगी है. बहरहाल उत्तर भारत के इन दो राज्यों में स्त्री पुरुष लिंग अनुपात की असली तस्वीर वर्ष 2011 में होने वाले अगली जनगणना के बाद ही पता लग पाएगी. | इससे जुड़ी ख़बरें देश भर की लड़कियाँ बिकती हैं हरियाणा में31 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस इकलौती लड़की होने पर एक लाख10 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस जनसंख्या नीति में बदलाव के संकेत23 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस घरेलू हिंसा रोकने के लिए क़ानून22 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस घटती जनसंख्या से चिंतित है पारसी समाज 07 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस 'महिलाओं को विचार बदलना होगा'04 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस आज भी भोगती हैं नारी होने का दंश07 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||