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घटती जनसंख्या से चिंतित है पारसी समाज | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जेआरडी टाटा, एबी गोदरेज, दादाभाई नौरोजी, नुस्ली वाडिया, होमी जहाँगीर भाभा और ज़ुबीन मेहता से लेकर रूसी मोदी तक उद्योग, विज्ञान, फिल्म, राजनीति या संगीत तक कोई भी दुनिया हो, इन नामों ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है. और इन सभी सफल नामों में एक बात समान है, और वो ये कि सभी पारसी हैं. लेकिन क्या आने वाले समय में पारसी भारतीय इतिहास के पन्नों में गुम हो जाएँगे? 2001 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक अब भारत में केवल 69,601 पारसी बचे हैं. ये आंकड़े अपने आपमें चिंता का विषय हैं क्योंकि पूरे विश्व में सिर्फ़ एक लाख पारसी हैं. दस साल पहले पारसियों की जनसंख्या 76,000 से ज़्यादा थी जो अब घटकर करीब 69,601 रह गई है. क्या ये समाज विलुप्त हो रहा है? घटती आबादी करीब 70 प्रतिशत पारसियों के घर तो सिर्फ़ मुंबई में हैं.
पूरे भारत में छह साल से कम उम्र के बच्चे औसतन 16 प्रतिशत हैं. जबकि पारसी समुदाय में ये संख्या घटकर 4.7 प्रतिशत रह गई है. 1941 से इस समाज की जनसंख्या लगातार घटती जा रही है. पारसी पत्रिका 'पासियाना' के संपादक जहाँगीर पटेल कहते हैं कि एक समय आएगा जब ये समुदाय इतिहास बनकर रह जाएगा. वे कहते हैं, ‘‘हमारी जनसंख्या 1941 में सबसे ज़्यादा थी, एक लाख 14 हज़ार. लेकिन उसके बाद जनसंख्या वृद्धि की दर शून्य से भी कम हो गई. ऐसा वक्त आएगा जब पारसी रहेंगे ही नहीं. हम सोच नहीं पा रहे हैं कि इसको किस तरह रोका जा सकेगा. शायद आगे जाकर जनसंख्या 20 हज़ार पर स्थिर हो जाए लेकिन लगता नहीं कि ऐसा होगा.’’ महिलाओं के कारण? पारसियों पर किताब लिख चुकी सोनी तारपोरवाला कहती हैं, "वर्ष 2020 तक भारत एक अरब 20 करोड़ की जनसंख्या के साथ विश्व में सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश होगा, लेकिन उस वक्त तक सिर्फ 23 हज़ार पारसी ही बचेंगे और फिर ये समुदाय नहीं जनजाति कहलाएगा, क्योंकि पारसी समाज सिकुड़ रहा है." कारण स्पष्ट है कि इस समाज में मृत्युदर जन्मदर से ज़्यादा है. पारसी मानते हैं कि वो अपने बेहतर जीवनशैली, विकास और महिलाओं को ज़्यादा अधिकार देने की क़ीमत चुका रहे हैं. जहाँगीर पटेल कहते हैं, ‘‘सारी दुनिया में यही देखा गया है कि जैसे-जैसे औरतों का सशक्तिकरण होता है, साक्षरता और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है और जन्मदर घटती है और भारत में भी ये होगा. वे कहती हैं, "जब तक हर पारसी शादी नहीं करेगा, तीन बच्चे पैदा नहीं करेगा, ये आंकड़े बदलने वाले नहीं. ये तो व्यक्तिगत अभिरुचि की बात है और इसमें बदलाव लाना आसान नहीं है.’’ इसीलिए लगातार जनसंख्या घटने की वजह मानी जाती है महिलाओं का शिक्षित होना, देर से शादी का चलन और केवल एक बच्चा पैदा करने की प्रवृत्ति. पारसी बताते हैं कि ज़्यादातर पारसी औरतें तीस साल की उम्र में शादी करती हैं और कई तो शादी करती ही नहीं. इस उम्र में महिलाओं के गर्भ धारण करने की क्षमता में भी कमी आ जाती है. इस समस्या से जूझने के लिए इस समाज ने छह महीने पहले एक विशेष चिकित्सालय खोलने की योजना बनाई. यहाँ दम्पतियों को मुफ्त सलाह और इलाज मिलता है. पिछले दो महीनों में 48 दम्पती यहाँ इलाज के लिए आ चुके हैं. इसको चलाने वाली डॉ. अनाहिता पैंडोले कहती हैं कि यह समस्या सबसे बड़ी है. वे कहती हैं, ‘‘पारसी लड़के और लड़की की मुलाकात होना मुश्किल होता है. लड़कियाँ काफी पढ़ लिख लेती हैं और चाहती हैं कि लड़का उनसे भी ज़्यादा पढ़ा लिखा हो जो और मुश्किल हो जाता है." इसके अलावा, कई पारसी विदेश भी चले जाते हैं. इसीलिए लड़के-लड़कियों में मेल-जोल बढ़ाने के लिए समाज कुछ कार्यक्रमों का आयोजन करती है जहाँ ये आपस में मिल-जुल सकें और साथ ही धर्म और पारसी संस्कृति के बारे में जान सकें. योजना और विवाद अपनी घटती जनसंख्या को रोकने के लिए पारसी पंचायत ने दस साल पहले एक नई योजना शुरू की थी.
इसके अनुसार हर पारसी परिवार को उनके तीसरे बच्चे के पालन-पोषण के लिए हर महीने 1000 रूपए दिए जाते हैं. लेकिन 10 सालों में केवल 90 परिवारों ने ही तीसरे बच्चे को जन्म दिया. इस छोटे से समुदाय को उसकी जनसंख्या के विवाद ने बाँट कर रख दिया है. पारसियों में प्रथा है कि अगर कोई पारसी लड़की ग़ैर पारसी लड़के से शादी करती है तो उसके बच्चे को अपनाया नहीं जाता यानी उसे पारसी नहीं माना जाता. जबकि अगर पारसी लड़का समुदाय के बाहर शादी करता है तो उसका बच्चा पारसी माना जाता है. नौशिर दादरवाला रूढ़िवादी हैं और मानते हैं कि अपनी पहचान खो देने से खत्म हो जाना बेहतर है. वे कहते हैं, ‘‘पारसियों की अपनी एक अलग पहचान है. भारत की एक अरब आबादी में भी आज हम पारसी को पहचान सकते हैं. लेकिन अगर हम दूसरे धर्मों को मानने वाले बच्चों को अपनाने लग जाएंगे तो हमारी पहचान ख़त्म हो जाएगी.’’ फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में डॉक्टर का किरदार निभाने वाले अभिनेता बोमन ईरानी कहते हैं, "ये नियम समुदाय के लिए हानिकारक है. समाज को बचाने के चक्कर में उसी को खत्म कर देंगे." हालाँकि पारसी पादरी डॉ रामयार करंजिया इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है, "2001 की जनगणना ने जो बखेड़ा खड़ा किया है. उसकी ज़रूरत नहीं है. जब हम 12 सौ साल पहले ईरान से भारत आए थे तो सिर्फ 18 हज़ार आदमी थे. पुराने से पुराने जनगणना में हमारी आबादी कभी भी एक लाख 14 हज़ार से ज़्यादा नहीं गई. फिर दूसरे देशों में जा बसे पारसियों को शामिल कर लें तो जनसंख्या में कमी बहुत ज़्यादा तो नहीं है." जनगणना आयोग के मुताबिक इस समुदाय को जल्द ही कदम उठाने होंगे. लेकिन चाहे कम संख्या में हो या ज़्यादा, पारसी आज भी भीड़ में आसानी से पहचाने जाते हैं. उनकी तीखी नाक, गोरा रंग, मनमौजी स्वभाव उनकी पहचान बन गई है और उनकी सफलताओं की कहानी मुंबई की सड़को पर चलने वाले हर व्यक्ति को नज़र आती हैं- प्रतिमाओं में, सड़कों और बिल्डिंगों के नामों में. |
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