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भारत में अहम न्यायिक सुधार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण क़दम उठाते हुए एक नई क़ानूनी व्यवस्था लागू की है जिसके तहत जेल में बंद आपराधिक मुक़दमे के किसी अभियुक्त को यह मौक़ा दिया जाएगा कि वह अगर अपना अपराध क़बूल कर ले तो उसे निर्धारित सज़ा से कुछ कम सज़ा देकर छोड़ दिया जाएगा. सरकार के इस नए क़ानूनी क़दम का देश के क़ानूनी समुदाय ने स्वागत करते हुए कहा है कि इससे देश की न्याय व्यवस्था पर बोझ बहुत हद तक कम करने में मदद मिलेगी और उन हज़ारों अभियुक्तों को भी राहत मिलेगी जो अपने मुक़दमों की सुनवाई होने का इंतज़ार कर रहे हैं. भारत में न्याय व्यवस्था पर मुक़दमों का बहुत बोझ है जिसकी वजह से वह धीमी गति के लिए जानी जाती है जहाँ बहुत से अभियुक्त अपने मुक़दमों की सुनवाई के इंतज़ार में बहुत से वर्ष जेल में गुज़ार देते हैं. लेकिन अब सरकार ने क़ानूनी और न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सुधार करते हुए यह व्यवस्था लागू की है कि आपराधिक मुक़दमे के अभियुक्त अपनी सज़ा कम होने की उम्मीद कर सकते हैं बशर्ते कि वे अपना अपराध स्वीकार कर लें और निर्धारित जुर्माने की भरपाई कर दें. हालांकि गृहमंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यह सिर्फ़ ऐसे अपराध के मामलों में लागू होगा जहाँ अधिकतम सज़ा सात साल से कम हो. वहीं यह क़ानून महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ अपराध, अनूसूचित जाति और जनजाति के लोगों के ख़िलाफ़ अपराध और पैसे के अवैध लेन-देन के मामलों में लागू नहीं होगा. कुछ कानून विदों का कहना है कि ये अपवाद कानून सुधार के लक्ष्यों को पूरा होने में रुकावट पैदा करेंगे. नई व्यवस्था इस नई व्यवस्था के तहत अभियुक्त को एक अर्ज़ी दाख़िल करनी होगी और मुद्दई और बचाव पक्ष अगर इस पर सहमत होते हैं तो अदालत इसे स्वीकार करेगी. अदालत का यह संतुष्ट होना भी ज़रूरी है कि यह अर्ज़ी स्वैच्छिक तौर पर दाख़िल की गई है. वकीलों का कहना है कि यह ज़रूरी है कि अदालत यह सुनिश्चित करे कि अपराध स्वीकार करने के पीछे स्व इच्छा या दबाव के बीच साफ़-साफ़ फ़र्क दिखाई दे. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारत में बहुत से मुक़दमों में इक़बालिया बयान पुलिस के दबाव में सामने आते हैं. सरकार ने यह पेशकश देश की क़ानून व्यवस्था में अनेक सुधारों के तहत की है. इन सुधारों के तहत देश की फौजदारी अदालतों में सुधार किया जाएगा जहाँ बहुत से क़ानून औपनिवेशिक दौर से ही चले आ रहे हैं. सरकार का विश्वास है कि अपराध स्वीकार करने के बदले सज़ा कम कराने की इस पेशकश से लगभग पचास हज़ार ऐसे अभियुक्तों को राहत मिलेगी जो अपने मुक़दमों की सुनवाई के इंतज़ार में जेल में बंद हैं. वकीलों ने इस क़ानूनी सुधार को सरकार का एक प्रगतिशील क़दम क़रार देते हुए कहा है इससे बहुत से मुक़दमों के त्वरित निपटारे में मदद मिलेगी और अदालतों पर बोझ कम होगा. अलबत्ता क़ानूनी जानकारों का कहना है कि यह एक अच्छी शुरूआत है और उन्हें उम्मीद है कि आगे चलकर यह सुधार और राहत गंभीर अपराधों के लिए भी बढ़ाया जा सकेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें भारत-पाकिस्तान के क़ैदियों की रिहाई30 जून, 2006 | भारत और पड़ोस सलमान ख़ान नई मुसीबत में फंसे26 जून, 2006 | भारत और पड़ोस आपराधिक दंड संहिता में अहम संशोधन23 जून, 2006 | भारत और पड़ोस बयान बदलने के लिए एक और सज़ा12 जून, 2006 | भारत और पड़ोस राहुल न्यायिक हिरासत में, तिहाड़ गए08 जून, 2006 | भारत और पड़ोस गुजरात में चार को उम्र क़ैद18 मई, 2006 | भारत और पड़ोस बलात्कार के मामले में सांसद को जेल12 मई, 2006 | भारत और पड़ोस फूलन हत्याकांड का अभियुक्त ग़िरफ़्तार25 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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