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'विवाह पंजीकरण सभी के लिए अनिवार्य'
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मूल आदेश से पहले महिला आयोग से विस्तृत राय माँगी थी
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी के रजिस्ट्रेशन यानी पंजीकरण को अनिवार्य बनाने का उसका पिछले साल का आदेश समाज के सभी वर्गों और समुदायों पर लागू होता है.

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि इस आदेश को लागू करने के लिए तीन महीने के भीतर सभी ज़रूरी क़ानून और नियम बनाए जाएँ.

सर्वोच्च अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि तीन महीने बाद आदेश का पालन होने के बारे में रिपोर्ट और एक हलफ़नामा दायर किया जाए.

इससे पहले अदालत के ध्यान में ये आया था कि कई राज्यों में शादी का पंजीकरण केवल हिंदू समुदाय के सदस्यों के लिए ही अनिवार्य बनाया गया है.

पिछले साल फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि शादी के पंजीकरण को ज़रूरी बनाने के लिए उपयुक्त क़ानून बनाए जाएँ.

अब तक भारत में विवाह विभिन्न धर्मों और सामाजिक परंपराओं के अनुसार होते आए हैं और इसे अदालतें मान्यता देती आई हैं.

महिला आयोग का मत

 आयोग ने अपनी ओर से जिस विधेयक का प्रस्ताव रखा उसे अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग से चर्चा करके बनाया गया और हमें नहीं लगता कि इसे लागू करने में कोई मुश्किल होगी
मूल आदेश पर गिरिजा व्यास

पिछले साल शादी के पंजीकरण पर फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनाया था. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय महिला आयोग की राय भी माँगी थी.

महिला आयोग ने पंजीकरण को अनिवार्य बनाने का समर्थन किया था.

पिछले साल आए फ़ैसले से पहले महिला आयोग ने अदालत के समक्ष अपनी राय रखी थी कि यदि विवाह के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य कर दिया जाता है तो बाल-विवाह या कम उम्र में विवाह और महिलाओं के शोषण को रोका जा सकता है.

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास ने उस समय बीबीसी से हुई बातचीत में इस फ़ैसले का स्वागत किया था.

जब गिरिजा व्यास से पूछा गया था कि ऐसे क़ानून को लागू करना कितना व्यावहारिक होगा, उनका कहना था, "आयोग ने अपनी ओर से जिस विधेयक का प्रस्ताव रखा उसे अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग से चर्चा करके बनाया गया और हमें नहीं लगता कि इसे लागू करने में कोई मुश्किल होगी."

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