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श्रीलंका मे स्थितियाँ क़ाबू से बाहर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका में युद्ध हो रहा है. शांति प्रक्रिया का अंत हो गया है. वर्ष 2002 में श्रीलंका सरकार और तमिल अलगाववादी संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) के बीच हुआ युद्धविराम औपचारिक रूप से 16 जनवरी को समाप्त हो गया. असल में तो युद्ध विराम की शर्तें दोनो पक्षों ने दो साल पहले से ही तोड़नी शुरू कर दी थीं. श्रीलंका सरकार की माने तो ये शांति प्रक्रिया बेमानी रही और तमिल छापामार कहते हैं कि वे प्रक्रिया जारी रखना चाहते हैं हालांकि इसका खुलकर उल्लंघन भी करते रहे हैं. तो क्या ये माना जाए कि युद्धविराम पूरी तरह से विफल रहा ? अंतरराष्ट्रीय समुदाय एलटीटीई के प्रमुख प्रभाकरन के जीवन पर पुस्तक लिख चुके पत्रकार एमआर नारायणस्वामी कहते हैं, "आखिरकार एक बात हम लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय हो या भारत की सरकार हो बल्कि ऊपर वाला भगवान भी हो, कोई भी चाहे कि श्रीलंका में शांति होनी चाहिए लेकिन शांति वहाँ तभी आएगी जब वहाँ के दो पक्ष जो पिछले 25 वर्ष से लड़ रहे हैं वो इसे समझें और इस नतीजे पर पहुंचें कि उन्हें शांति चाहिए." शांति की राह खोजते-खोजते श्रीलंका को 25 साल से ज्यादा समय हो गया है और आज ज़मीनी हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. वर्ष 2005 में जब महेन्दा राजपक्षे की सरकार गठित हुई थी तो आशा की जा रही थी कि वो सुधारवादी रूख अपनायेंगे और देश की सिंहला और तमिल आबादी को साथ लेकर आगे बढ़ेंगे. पर ये आशा अधूरी ही रह गई. मानवीय त्रासदी कोलंबो में समाचारपत्र हिंदू के संवाददाता मुरलीधर रेड्डी मानते हैं कि श्रीलंका एक बड़ी मानवीय त्रासदी झेल रहा है. उनका कहना है, "नार्वे, अमरीका, जापान और भारत भी श्रीलंका को बार बार एक ही बात कह रहे हैं कि आपको तमिल लोगों के लिए एक राजनीतिक पैकेज लाना होगा क्योंकि युद्ध से ये बात खत्म होने वाली नहीं है. तमिल लोगों की मांगों और चिंताओं का समाधान करना जरूरी है." रेड्डी कहते हैं कि सरकार ने वादा किया है कि इस महीने के अंत तक वो एक पैकेज पेश करेगी. अब देखना होगा कि ये पैकेज क्या होगा और इससे लोग संतुष्ट होंगे या नहीं.
वर्ष 2002 का युद्धविराम नार्वे की मध्यस्थता से हुआ था. एलटीटीई पर प्रतिबंध लगाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अपनी तरफ से कोशिश की थी कि श्रीलंका शांति की राह पकड़े. थोड़ा दबाव सरकार पर भी डाला गया पर ये दबाव कागजों में सिमट कर रह गया जैसा कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया विभाग के प्रोफेसर पी सहदेवन भी मानते हैं. सहदेवन कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बयान देने और चिंता जताने के बजाए कुछ सख्त कदम उठाना चाहिए. केवल बयान जारी करने से कोई असर नहीं पड़ता. अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए ये जरूरी है कि वो दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश करे कि युद्ध से कोई फायदा नहीं और उन पर दोबारा शांति प्रक्रिया शुरू करने के लिए दबाव डाले." सरकार का नजरिया श्रीलंका को देखने समझने वाले कहते हैं कि सिंहला बौद्घ चश्मे से जब तक सरकार वहां की स्थिति देखेगी, तमिल आशाओं, अभिलाषाओं को पूरा महत्व नहीं देगी और देश दो पाटों में पिसता रहेगा.
भारत के श्रीलंका में उच्चायुक्त रह चुके लखन मेहरोत्रा कहते हैं, "भविष्य को अतीत के अपने अनुभवों से भी देखना चाहिए. 1987 में एक समझौता हुआ उसमे पहले एलटीटीई ने कहा कि ये ठीक है हमारे लिए फिर बाद में मुकर गए. श्रीलंका में अंतरजातीय संघर्ष में लगे दोनों दलों के उद्देश्य अभी भी एक दूसरे से इतने दूर हैं कि शांति की कल्पना करना बहुत कठिन है." सिंहला राष्ट्रवाद को आप ब्रिटेन के साम्राज्यवादी दिनों से देख सकते हैं. ये तब विदेशी ताकत के विरूद्ध उभरी आवाज थी जो कि तमिल हितों से इतर केवल सिंहला हित के राष्ट्रवाद में तब्दील हो गई. आज देश की हालत ये है कि राष्ट्रीय सरकार एक समुदाय के हित की ही सोचने लगी है और तमिलों को समान अधिकार नहीं मिल रहे. ऐसे परिदृश्य में दक्षिणपंथी तमिल और सिंहला ताकतों को मजबूती मिली है. शायद यही एक कारण है कि तमिल छापामार इतने साल अपना आंदोलन चला पाए हैं. वास्तविक स्थिति वास्तविक स्थिति आखिर क्या है. एमआर नारायणस्वामी का मानना है, "पिछले दो साल में खासकर एलटीटीई की काफी पिटाई हुई है. उनका संगठन कमजोर भी हुआ है और उसके एक दो प्रमुख नेता भी मारे गए हैं जो पहले कभी नहीं हुआ लेकिन मैं नहीं समझता हूं कि प्रभाकरन को किसी तरह की हानि पहुंची है." नारायणस्वामी का कहना है, " जब तक श्रीलंका सरकार इस बात के लिए राजी नहीं हो कि वहाँ की जो लड़ाई का राजनीतिक समाधान होना चाहिए तब तक एलटीटीई खत्म नहीं होगा चाहे उसके नेता मर जाएँ चाहे उसके कैडर मरें." अब चूंकि श्रीलंका की शांति प्रक्रिया पर नजर रख रहे देश वहां से निकल चुके हैं. बढ़ी हुई हिंसा से गैर सरकारी संगठन भी एलटीटीई की पकड़ वाले क्षेत्रों से निकल गए हैं इसलिए कोई इस संगठन की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन नहीं कर सकता. भारत पर प्रभाव श्रीलंका की बढ़ती हिंसा का सीधा असर भारत पर होता है. पर भारत 1987 और आईपीकेएफ के दिनों को नहीं भूला है इसलिए वो श्रीलंका में दोबारा हाथ नहीं जलाना चाहता. प्रोफेसर पी सहदेवन भारत की इस चुप्पी को सही नहीं मानते. उनका कहना है, "ये चिंता की बात है कि श्रीलंका के प्रति भारत की कोई सक्रिय नीति नहीं रही एक पड़ोसी देश होने के नाते जिसका कि इस क्षेत्र में काफी प्रभाव है. भारत को ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे श्रीलंका सरकार पर अपने रूख को बदलने के लिए दबाव डाला जा सके." वो आगे कहते हैं, "अगर भारत अकेले कुछ नहीं करना चाहता है तो उसे कम से कम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर कोई कदम उठाना चाहिए जिससे जमीनी स्तर पर इसका कोई असर दिखे." वहीं एमआर नारायणस्वामी का भी तर्क है सबसे करीबी पड़ोसी देश होने के नाते भारत श्रीलंका के घटनाक्रम से काफी चिंतित है. पर वो ये भी जानता है कि उसके सुझावों को श्रीलंका की कई शक्तियां सुनना भी पसंद नहीं करती. वो कहते हैं, "भारत के लिए ये चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि नार्वे, इंग्लैंड और अमरीका चाहे कुछ भी बोलें और कुछ भी करें आखिरकार श्रीलंका उनके करीब नहीं है यानी अगर वहां से शरणार्थी भागते हैं तो सबसे पहले भारत के तमिलनाडु में आते हैं." नारायणस्वामी आगे कहते हैं, " भारत के ऊपर जो प्रभाव पड़ता है वो और किसी देश पर नहीं पड़ता. लेकिन ये लोगों की धारणा है और मैं समझता हूं कि थोड़ी सी गलत धारणा है कि अगर भारत हस्तक्षेप करेगा तो वहां पर शांति आ जाएगी." पर क्या इस डर से अंतरराष्ट्रीय समुदाय और भारत को चुपचाप इस मानवीय त्रासदी को देखते रहना चाहिए? राजनयिक लखन मेहरोत्रा ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है, "मैं ये मानकर चलता हूँ कि दबाव तो बराबर बना रहना चाहिए और वो दबाव दोनों पक्षों के ऊपर होना चाहिए." मेहरोत्रा कहते हैं, "हम निरपेक्ष रूप से ये कहें कि तमिल लोगों की तरफ से भी जो हत्याएँ हो रही हैं वो भी मानवाधिकारों के विपरीत हैं और जो सिंहला लोगों की ओर से बमबारी निर्दोष लोगों के खिलाफ हो रही है वो भी मानवीय अधिकारों के विरूद्ध है और इसलिए विश्व की जो आत्मचेतना है वो उसके खिलाफ जरूर उठनी चाहिए." भविष्य इस बीच श्रीलंका के ब्रिटेन में रह रहे तमिलों के एक संगठन का मानना है कि सरकारी विमान सेवा का बहिष्कार कर वो कुछ हद तक महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह की तर्ज़ पर श्रीलंका सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचा कर अपना संदेश दे सकते हैं.
मगर सैन्य समाधान पर ज़ोर देने वाली राजपक्षे सरकार पर इसका कितना असर होगा ये कहा नहीं जा सकता. तो फिर क्या होगा श्रीलंका में आने वाले दिनों में? पी सहदेवन की माने तो तस्वीर निराशा भरी है. उनका मानना है, "श्रीलंकाई तमिलों का श्रीलंका से बाहर और श्रीलंका के अंदर ही दूसरे इलाकों में भारी संख्या में पलायन हो सकता है. एलटीटीई नए लोगों का भर्ती करने की कोशिश कर सकती है जिससे बच्चों को निशाना बनाया जा सकता है. मुद्रास्फीति के लगातार बढ़ते रहने से देश को आर्थिक संकट से गुजरना पड़ सकता है." सहदेवन आगे कहते हैं, "अगर सरकार एलटीटीई को कमजोर करने में सफल होती है तो उसकी लोकप्रियता बढ़ेगी लेकिन मेरा ख्याल है कि जब तक युद्ध जारी रहेगा सरकार की लोकप्रियता बाकी रहेगी लेकिन युद्ध जीतने के बाद सरकार की लोकप्रियता घट जाएगी क्योंकि लगातार आर्थिक परेशानी से गुजर रहे लोग जल्द से जल्द एक अच्छी जिंदगी गुजारने के लिए इस आर्थिक परेशानी से बाहर आने की कोशिश करेंगे." इस समय श्रीलंका एक खूनी संघर्ष के दौर से गुजर रहा है और फिलहाल इससे उत्पन्न मानवीय त्रासदी का कोई अंत नजर नहीं आ रहा.. और शायद आने वाले कुछ महीने श्रीलंका के भविष्य का निर्धारण करेंगे. |
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