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बुधवार, 14 नवंबर, 2007 को 15:44 GMT तक के समाचार
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श्रीलंका के कामगारों के साथ 'दुर्व्यवहार'
फ़ाइल फ़ोटो
खाड़ी देशों में श्रीलंका के प्रवासी कामगारों के साथ दुर्व्यवहार होता है
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि खाड़ी देशों में श्रीलंका की प्रवासी कामगारों को गंभीर दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है, जिसे रोकने में ये देश नाकाम हो रहे हैं.

इन प्रवासी कामगारों में ज़्यादातर महिलाएँ होती हैं जिनसे घरेलू नौकरानी का काम लिया जाता है.

ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि घरेलू नौकरानियों के साथ संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत और लेबनान में ज़्यादादुर्व्यवहार होता है.

इस मानवाधिकार संस्था का कहना है कि इन देशों में मालिक अपने यहाँ काम करने वाली महिलाओं के पासपोर्ट ज़ब्त कर लेते हैं. साथ ही उन्हें काम करने की जगह से बाहर भी नहीं जाने दिया जाता है.

संयुक्त अरब अमीरात ने इन आरोपों को यह कहते हुए ख़ारिज़ कर दिया है कि मानवाधिकार संस्था ने कामगारों की अवस्था में सुधार लाने की उनकी कोशिशों को नज़रअंदाज़ किया है.

उल्लेखनीय है कि श्रीलंका की छह लाख साठ हज़ार से भी ज़्यादा प्रवासी महिलाएँ विदेशों में घरेलू नौकरानी के रूप में काम करती है जिनमें तक़रीबन 90 प्रतिशत खाड़ी देशों में हैं.

'बेरहम मालिक'

ह्यूमन राइट्स वॉच की 131 पन्नों की इस रिपोर्ट में इन महिलाओं के देश छोड़ने के बाद से लेकर हर मोड़ पर उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार का ब्यौरा दिया गया है.

ह्यूमन राइट्स वॉच के साथ काम कर रही एक शोधार्थी जेनीफ़र टर्नर ने कहा, "घरेलू नौकरानियों की सप्ताह में एक दिन की छुट्टी को निश्चित नहीं करके, काम के दिनों में घूमने-फिरने की आज़ादी को रोक कर और इसी तरह के अन्य सामान्य अधिकारों की गारंटी सुनिश्चित नहीं कर खाड़ी देशों की सरकारें श्रीलंका की घरेलू नौकरानियों के साथ गंभीर दुर्व्यहार करती हैं."

यह रिपोर्ट घरेलू कामगरों, सरकारी कर्मचारियों और प्रवासी कामगरों को नौकरी दिलाने वाली संस्था के 170 लोगों के इंटरव्यू पर आधारित है. यह इंटरव्यू श्रीलंका और खाड़ी क्षेत्र के देशों में लिया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू कामगार एक दिन में 16 से 21 घंटे काम करते हैं और उन्हें इस दौरान सुस्ताने का भी मौक़ा नहीं मिलता. इन्हें एक घंटे के काम के बदले बहुत ही कम रक़म, 15 से 20 अमरीकी सेंट के बीच, दी जाती है.

 कामगारों की हफ़्ते में एक दिन की छुट्टी को निश्चित नहीं कर, काम के दिनों में घूमने-फिरने की आज़ादी को रोक कर और इसी तरह के अन्य अधिकारों, जिनका आम तौर पर कामगार यूँ ही आनंद लेते हैं, को सुनिश्चित नहीं कर खाड़ी देशों की सरकार श्रीलंका के घरेलू कामगरों के साथ दुर्व्यहार करती हैं
मानवाधिकार कार्यकर्ता, जेनीफ़र टर्नर

मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात की सरकार को चाहिए की मज़दूरों के लिए जो का़नून मौजूद हैं उन्हें घरेलू कामगारों पर भी लागू किया जाए.

"साथ ही इन सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए की कामगारों की समस्याओं को सुना जाए और आप्रवासी क़ानूनों में सुधार किया ताकि कामगरों को मालिकों के साथ बँधकर नहीं रहना पड़े."

ग़ौरतलब है कि श्रीलंका मे बेरोज़गारी की भीषण समस्या है. श्रीलंका की विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा इन प्रवासियों की भेजी गई रक़म से ही बनता है.

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