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यूएई में प्रवासी कामगारों का शोषण | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन 'ह्यूमन राइट्स वॉच' ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि संयुक्त अरब अमीरात सरकार प्रवासी कामगारों का शोषण नहीं रोक पा रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार निर्माण कार्य में काम करने वाले पांच लाख प्रवासी कामगारों के अधिकारों का उनके मालिकों और नियोक्ता एजेंसियों के हाथों होने वाले ज़बर्दस्त हनन को रोकने में विफल रही है. ह्यूमन राइट्स वॉच ने संयुक्त अरब अमीरात के प्रधानमंत्री शैख़ मोहम्मद बिन राशिद अल-मख़तूम को पिछले महीने लिखे अपने एक पत्र में इस शोषण की ओर सरकार का ध्यान दिलाया. इसके बाद प्रधानमंत्री शैख़ मोहम्मद बिन राशिद अल-मख़तूम ने अपने श्रम मंत्री से कहा है कि श्रम क़ानून को लागू किया जाए और ह्यूमन राइट्स वॉच की सिफ़ारिशों के आधार पर तुरंत सुधार किया जाए. ह्यूमन राइट्स वॉच की मध्यपूर्व की निदेशक सारा लियाह व्हिटसन ने कहा, “जब तक सरकार क़ानून तोड़ने वालों पर जुर्माना नहीं करती संयुक्त अरब अमीरात की यह आसमान को छूती हूई इमारतें मज़दूरों के शोषण के स्मारक के तौर पर ही याद की जाएंगी.” 60 कामगारों, सरकारी अधिकारियों और व्यापारिक प्रतिनिधियों से साक्षात्कार पर आधारित 71 पन्नों की यह रिपोर्ट में मालिकों द्वारा निर्माण कार्य में लगे कामगारों के गंभीर शोषण को दिखाया गया है. इसमें बेगार या बहुत ही कम मज़दूरी, वर्षों रोज़गार एजेंसियों के क़र्ज़ तले दबे रहना आदि का ज़िक्र किया जा रहा है. इसके अलावा कामगारों के पासपोर्ट अपने पास रख लेना और ख़तरनाक स्थितियों में काम करने जैसे क़ानून के गंभीर दुरूपयोग शामिल हैं जिसके कारण प्रत्यक्ष तौर पर मृत्यु और घायल होने की दर काफ़ी बढ़ गई है. शोषण की कहानी दुबई से काम करके लौटे बिहार के सीतामढ़ी ज़िले के एक कामगार फ़िरोज़ अहमद ने ह्यूमन राइट्स वॉच के प्रवासी कामगारों के हाल का नोटिस लेने को अच्छा क़दम बताते हुए कहा कि इससे वहाँ काम करने वाले मज़दूरों को राहत मिलेगी. हालांकि फ़िरोज़ अहमद ने यह भी कहा कि शोषण वहाँ से अधिक मुम्बई के एजेंट करते हैं जो कभी तो नौकरी के लिए विदेश जाने की लालसा लेकर आए ग़रीब अनपढ़ लोगों का पैसा लेकर भाग जाते हैं, कभी उनको महीनों दौड़ाते रहते हैं और कभी उन्हें किसी नौकरी के बारे में बता कर किसी और काम के लिए भेज देते हैं.
उनका कहना है कि मुम्बई जैसे शहर में गुज़ारा करना वैसे ही मंहगा है और ऊपर से पैसा फँसे होने का मानसिक तनाव समस्या को और भी गंभीर बना देता है. कई देशों में एलेक्ट्रीशियन की हैसियत से काम कर चुके बिहार के एक युवक दस्तगीर उर्फ़ कल्लू ने अबूघाबी, दुबई और शारजाह से वापसी पर बताया, "अपने मालिकों के शोषण से भागे हुए लोग शुक्रवार के दिन जुमे की नमाज़ के बाद जुमेरा के पास सैकड़ों की संख्या में रोते-बिलखते और अपने लोगों को याद करते हुए दिख जाते हैं." कल्लू का मानना है कि वहाँ उनका कोई मदद करने वाला नहीं है, वह अपने देश वापस भाग आना चाहते हैं मगर उसमें भी उनको सफलता नहीं मिलती है क्योंकि वह किसी दूसरे के हत्थे चढ़ जाते हैं और शोषण का सिलसिला चलता रहता है. यूएई में काम करने वालों में सब से अधिक संख्या दक्षिण एशिया के लोगों की है और इन में भी भारत का नम्बर पहला ही है. निर्माण कार्य में अधिकतर लोग इलेक्ट्रीशियन, फ़िटर, फ़ोरमैन, ड्राईवर के रूप में जाते हैं. जिनके पास अपने काम का कम या कोई अनुभव भी नहीं होता. कोरा आश्वासन इस वर्ष के शुरु में कामगारों के लगातार ज़ोरदार प्रदर्शन और हड़ताल के बाद संयुक्त अरब अमीरात की सरकार ने ट्रेड यूनियन को क़ानूनी हैसियत देकर काम करने वालों के अधिकारों का आदर करने और कामगारों के बारे में अपने क़ानून को कड़ाई से लागू करने का वचन दिया था. लेकिन ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में यह दर्शाया गया है कि सरकार ने पिछले क़ानून को लागू नहीं किया है. ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह भी पाया कि निर्माण उद्योग में शामिल किसी भी मालिक का सरकारी रिकॉर्ड नहीं है जिससे कि उसे कोई जुर्माना भरने के लिए बाध्य किया जा सके या श्रम क़ानून का उल्लंघन करने का दोषी पाए जाने पर दंडित किया जा सके. संयुक्त अरब अमीरात में इस समय निर्माण का कारोबार तेज़ी से फलफूल रहा है और निर्माण के क्षेत्र में कार्यरत पाँच लाख कामगारों में से लगभग सभी या अधिकतर प्रवासी हैं, उनमें से अधिकतर दक्षिण एशियाई हैं. 27 लाख 38 हज़ार प्रवासी कामगार देश में कामगारों की कुल संख्या का 95 प्रतिशत हैं.
व्हिटसन का कहना है, “सैंकड़ों चमचमाती ऊँची इमारतों का निर्माण बाहर से लाए गए कामगारों द्वारा अत्यधिक शोषणकारी परिस्थितियों में काम के नतीजे में ही संभव हो पाया है.” संयुक्त अरब अमीरात में मौजूद नियोक्ता निर्माण कार्यों के लिए प्रवासी कामगारों को संयुक्त अरब अमीरात और अन्य जगह स्थित रोज़गार दिलाने वाली एजेंसियों के ज़रिए बुलाते हैं. यह एजेंसियां मालिकों के बजाय ग़ैरक़ानूनी तौर पर कामगारों को यात्रा ख़र्च, वीज़ा, सरकारी फीस और रोज़गार दिलाने की सेवाओं के नाम पर दो-तीन हज़ार अमरीकी डालर अदा करने को बाध्य करती हैं. निर्माण कार्य में जुटे कामगारों के वेतन जो कि 106 से 250 अमरीकी डॉलर प्रति माह है, देश की औसत आय 2106 डॉलर प्रतिमाह से काफ़ी कम है. संयुक्त अरब अमीरात में सात देश अबू-धाबी, दुबई, अजमान, फ़ुजैरह, रास अल-ख़ीमा, उम्मल-क़ुवैन (जिसे अल-ऐन भी कहते हैं), और शारजाह शामिल है. | इससे जुड़ी ख़बरें दुबई के मजबूर भारतीय मजदूर10 फ़रवरी, 2005 | पहला पन्ना 'सशस्त्र संघर्ष में बच्चों का शोषण'27 जुलाई, 2005 | पहला पन्ना यूनीसेफ़ ने बाल श्रमिकों पर चिंता जताई21 फ़रवरी, 2005 | पहला पन्ना दुबई में होगी सबसे ऊँची इमारत09 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना दुबई में समुद्र के बीच बसेगी नई दुनिया24 सितंबर, 2004 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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