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शुक्रवार, 26 अक्तूबर, 2007 को 18:03 GMT तक के समाचार
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नानावती आयोग ने तहलका का टेप माँगा
गुजरात दंगे
गुजरात के दंगों में एक हज़ार से अधिक लोग मारे गए थे
साप्ताहिक पत्रिका तहलका की ताज़ा रिपोर्ट के बाद गुजरात दंगों की जाँच कर रहे नानावती आयोग ने वो टेप मंगवाए हैं और कहा है कि वह इन टेपों को जाँच में शामिल करेगा.

उधर गुजरात के चुनाव आयोग ने अहमदाबाद के ज़िलाधीश से उस आदेश के लिए जवाब माँगा है जिसमें कुछ टीवी चैनलों को अहमदाबाद में दिखाने पर रोक लगा दी गई थी.

उल्लेखनीय है कि 'तहलका' ने ख़ुफ़िया कैमरे में कई हिंदू नेताओं के बयान क़ैद कर लिए हैं.

इसमें ये नेता न केवल दंगों में अपनी भागीदारी स्वीकार कर रहे हैं बल्कि वे कह रहे हैं कि दंगों के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका हौसला बढ़ाया था.

इस रिपोर्ट को भारत के टीवी चैनल आजतक ने गुरुवार को प्रसारित किया था. इसके बाद से देश भर में एकबार फिर राजनीति गरमा गई है.

कांग्रेस ने जहाँ नरेंद्र मोदी का इस्तीफ़ा माँगा है वहीं भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन इसका फ़ैसला अदालत में होना चाहिए.

भाजपा ने इसे कांग्रेस की साज़िश भी बताया है.

टेप मंगवाया

गुजरात दंगों की जाँच कर रहे दो सदस्यीय आय़ोग के प्रमुख जस्टिस जीटी नानावती ने शुक्रवार को तहलका की नई रिपोर्ट के टेप मंगवाए हैं.

जस्टिस नानावती ने टीवी चैनल को पत्र लिखकर ये टेप मंगवाए हैं और कहा है कि वे इन टेपों को अपनी जाँच में शामिल करना चाहते हैं.

अहमदाबाद में पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा कि वे ख़ुद इस रिपोर्ट को देखना चाहते थे लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके क्योंकि केबल पर उस समाचार चैनल को दिखाना बंद कर दिया गया.

जस्टिस नानावती ने कहा है कि वे देखना चाहते हैं कि वकील अरविंद पाँड्या ने आयोग के जस्टिस केजी शाह के बारे में क्या-क्या कहा है.

वैधानिकता

एक बड़ा सवाल यह है कि ख़ुफ़िया कैमरे में क़ैद किए गए हिंदू नेताओं के बयान वाले टेप क्या न्यायलय में सबूत के तौर पर स्वीकार किए जा सकते हैं?

 अदालत बिल्कुल इन्हें सबूत के तौर पर मान्यता देगी, और देना भी चाहिए
प्रशांत भूषण, वरिष्ठ वकील

इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण मानते हैं कि इन टेपों को सबूत के तौर पर अदालत में पेश किया जा सकता है.

बीबीसी से हुई बातचीत में प्रशांत भूषण ने कहा, "अदालत बिल्कुल इन्हें सबूत के तौर पर मान्यता देगी, और देना भी चाहिए."

उनका कहना था कि इन टेपों से प्रथमदृष्टया तो यह दिखता ही है कि दंगों में क्या-क्या हुआ था.

टेपों की प्रामाणिकता के सवाल पर उन्होंने कहा कि टेपों की प्रामाणिकता की जाँच में तो समय लगता नहीं और अदालत चाहे तो दो दिनों में प्रामाणिकता की रिपोर्ट आ सकती है.

एक सवाल के जवाब में प्रशांत भूषण ने माना कि अदालत चाहे तो ख़ुद इन टेपों का संज्ञान ले सकता है, जैसा कि उसने कई जनहित याचिकाओं के मामले में लिया है.

चैनलों पर रोक

अहमदाबाद से दिव्य भास्कर के स्थानीय संपादक अजय उमठ ने बीबीसी को बताया कि तहलका की रिपोर्ट प्रसारित होने के बाद अहमदाबाद के ज़िलाधीश और वड़ोदरा के पुलिस कमीश्नर ने आजतक, हेडलाइन्स टुडे और आईबीएन-7 पर के प्रसारण पर रोक लगा दी थी.

नरेंद्र मोदी
दंगों के समय नरेंद्र मोदी की भूमिका पर फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं

उनका कहना है कि वड़ोदरा के पुलिस कमीश्नर का आदेश तो मौख़िक था और उन्होंने बाद में यह आदेश वापस भी ले लिया लेकिन अहमदाबाद के ज़िलाधीश का आदेश लिखित आदेश था और शुक्रवार को रात तक भी यहाँ लोग इन चैनलों पर प्रसारित रिपोर्ट को नहीं देख पा रहे हैं.

ज़िलाधीश धनंजय त्रिवेदी ने केबलटीवी क़ानून की धारा पाँच का हवाला देते हुए इन चैनलों के प्रसारण पर रोक लगाई है.

जिन इलाक़ों में केबल टीवी के ज़रिए प्रसारण होता है वहाँ ये चैनल नहीं दिख रहे हैं.

इस रोक पर चुनाव आयोग ने ज़िलाप्रशासन से जवाब माँगा है कि उन्होंने किस आधार पर चैनलों पर ये रोक लगाई है. ज़िला प्रशासन के अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि उन्हें आयोग का नोटिस मिला है.

इस बीच प्रशासन ने शरदपूर्णिमा पर पुराने और नए अहमदाबाद में होने वाले विशेष गरबा आयोजनों पर भी रोक लगा दी है.

विवाद

गुरुवार रात को तहलका की इस नई रिपोर्ट ने देश भर में नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है.

कांग्रेस सहित कई पार्टियों ने तहलका टेप में दिखाए गए लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की है.

 तहलका के टेपों को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए
सीपीएम

लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने गुजरात सरकार पर लगाए गए आरोपों को ख़ारिज करते हुए इसे कांग्रेस की साज़िश बताया है.

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर गुजरात दंगों की सीबीआई जाँच का अनुरोध किया है.

भाजपा ने उन दावों को ख़ारिज कर दिया है कि गुजरात सरकार ने वर्ष 2002 में दंगों के दौरान मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा का समर्थन किया.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने कहा है कि तहलका के टेपों को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

दूसरी ओर केंद्रीय रेल मंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने तहलका टेपों के मद्देनज़र गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी की मांग की है.

तहलका पत्रिका ने ख़ुफ़िया तरीक़े से फ़िल्माए गए वीडियो के आधार पर ये आरोप लगाए हैं. उस समय भी गुजरात में भाजपा की सरकार थी और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे.

तहलका के आरोपों वाले वीडियो को टेलीविज़न चैनल पर भी दिखाया गया.

गुजरात में दिसंबर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

दावा

तहलका का दावा है कि पिछले छह महीने के दौरान फ़िल्माए गए इन वीडियो में कई कट्टरपंथी हिंदू नेताओं ने बताया है कि कैसे उन्होंने मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की. इन हिंदू नेताओं में कई भाजपा के भी नेता थे.

गोधरा ट्रेन
गोधरा में ट्रेन में आग लगने के बाद गुजरात में दंगे शुरु हुए थे

तहलका साप्ताहिक के संपादक संकर्षण ठाकुर कहते हैं, "गोधरा के बारे में कई लोग कहते आ रहे हैं कि साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग एक सुनियोजित साज़िश का परिणाम थी और उसके बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा एक प्रतिक्रिया. पर हमारी तफ़्तीश यह कहती है कि दरअसल साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में लगी आग एक सोची समझी साज़िश नही थी और उसके बाद के दंगे एक सुनियोजित साज़िश का परिणाम थे."

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में अहमदाबाद के स्थानीय संपादक भरत देसाई कहते हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जान-बूझ कर चुप हैं और उनकी पार्टी विरोधियो पर तीखे प्रहार कर रही है.

देसाई का मानना है कि गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी ने भारी सफलता हासिल की थी और इस ताज़ा रिपोर्ट के कारण एक बार फिर उन्हें फ़ायदा हो सकता है.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगों के दौरान एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे जिनमें अधिकतर मुसलमान थे.

हालाँकि कई स्वतंत्र एजेंसियाँ मरने वालों की संख्या दो हज़ार तक बताती हैं.

गुजरात के गोधरा में एक ट्रेन में लगी आग में 59 हिंदुओं के मारे जाने के बाद दंगे भड़क उठे थे. आरोप है कि मुसलमानों की उग्र भीड़ ने इस ट्रेन में आग लगाई थी.

सुप्रीम कोर्ट और कई मानवाधिकार संगठनों ने गुजरात सरकार पर आरोप लगाया कि वह दंगों को रोकने में नाकाम रही. इस दंगों के लिए कई लोगों को दोषी ठहराया गया लेकिन अभी भी कई लोगों की भूमिका कठघरे में हैं.

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