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शुक्रवार, 26 अक्तूबर, 2007 को 04:33 GMT तक के समाचार
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गुजरातः चुनावों से पहले दंगों की ख़बर

भारतीय अख़बार
हिंदीभाषी अख़बारों में इस ख़बर को उतना महत्व नहीं मिला है

भारतीय मीडिया जगत के दो समूहों ने गुरुवार की शाम अपनी एक विशेष रिपोर्ट में दिखाया था कि वर्ष 2002 के गुजरात दंगों में जिन लोगों की कथित रूप से भूमिका थी उनका दंगों के बारे में क्या कहना है.

तहलका समाचार माध्यम और आजतक की ओर से किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन को भारतीय समाचार पत्रों में शुक्रवार को प्रमुखता से छापा गया है. हालांकि समाचार माध्यमों में इसपर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है.

हिंदी के समाचार पत्र इस पूरे प्रकरण को लेकर ज़्यादा उदासीन दिखते हैं और वहाँ इस ख़बर को वो प्रमुखता नहीं मिली है जो कि अंग्रेज़ी अख़बारों में देखने को मिलती है.

हिंदी के समाचार पत्रों में दैनिक भास्कर के अलावा पंजाब केसरी और राष्ट्रीय सहारा ने इस ख़बर को पहले पेज पर थोड़ी-थोड़ी जगह दी है वहीं जनसत्ता, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण और अमर उजाला के मुख्यपृष्ठ से यह ख़बर ग़ायब है.

अमर उजाला ने इसे पेज-3 पर, दैनिक जागरण और हिंदुस्तान ने इसे पेज-9 पर और नवभारत टाइम्स ने पेज 10 पर जगह दी है.

जहाँ एक ओर अंग्रेज़ी के समाचार पत्र द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, स्टेट्समैन, द ट्रिब्यून ने इसे अपने मुख्यपृष्ठ पर प्रमुखता से छापा है वहीं हिंदुस्तान टाइम्स, द हिंदु, पायनियर और एशियन एज जैसे कुछ अंग्रेज़ी अख़बारों के मुख्यपृष्ठ से यह ख़बर नदारद रही.

द हिंदू, एशियन एज और पायनियर ने इसे आज की ख़बरों में शामिल नहीं किया है और हिंदुस्तान टाइम्स ने इसे पेज-13 पर जगह दी है.

इंडियन एक्सप्रेस ने गुजरात दंगों की जाँच कर रहे जस्टिस नानावती की इस ख़बर पर की गई टिप्पणी को भी प्रमुखता से छापा है.

इसके मुताबिक जस्टिस नानावती ने कहा है कि वो इस स्टिंग ऑपरेशन रिपोर्ट को शुक्रवार को देखेंगे और प्रथमदृष्टया ऐसा लगता है कि रिपोर्ट में जो बयान दिखाए गए हैं, उन्हें संज्ञान में लिया जा सकता है.

फिर बेपर्दा दंगे

इस सनसनीखेज़ रिपोर्ट में सरकार में शामिल कुछ नेता, हिंदुवादी संगठनों से जुड़े पदाधिकारियों और यहाँ तक कि पुलिस महकमे के एक आला अधिकारी के बारे में कथित तौर पर बताया गया है कि किस तरह दंगों में अल्पसंख्यकों को मारा गया और प्रशासन की कथित मदद से दंगों की योजना को अमलीजामा पहनाया गया.

 राजनीतिक टीकाकार मानते हैं कि इस ख़बर से सामाजिक और सांप्रदायिक स्तर पर ध्रुवीकरण बढ़ेगा और इसका लाभ कट्टरवादी ताकतों को हो सकता है. ज़ाहिर है कि ध्रुवीकरण का हिंदू हितों की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी और राज्य के नेतृत्वकर्ता नरेंद्र मोदी को लाभ मिल सकता है

ग़ौरतलब है कि 27 फ़रवरी, 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों में आग लगने की घटना के बाद गुजरात भर में दंगे भड़क गए थे.

साबरमती एक्सप्रेस के जिन दो डिब्बों में आग लगी थी उनमें अयोध्या से लौट रहे हिंदू संप्रदाय के लोग सवार थे. इस घटना में लगभग 60 लोगों की मौत हो गई थी.

इस घटना के बाद गोधरा सहित गुजरात के कई हिस्सों में दंगे भड़क गए थे और मुसलमानों का बड़े पैमाने पर क़त्लेआम शुरू हो गया था. दंगों में महिलाओं, बच्चों सहित सैकड़ों अल्पसंख्यक मारे गए थे.

राजनीतिक पहलू

तहलका की इस रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार राज्य सरकार और कट्टर हिंदुवादी संगठनों के नेताओं को दंगों की कहानी बयाँ करते हुए दिखाया गया है.

भारतीय अख़बार
माना जा रहा है कि इससे नरेंद्र मोदी को नुकसान कम और फ़ायदा ज़्यादा होगा

राज्य में हाल ही में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में गुजरात दंगों पर इस विशेष रिपोर्ट के सामने आने के बाद कई तरह के सवाल भी खड़े हो रहे हैं.

मसलन, गुजरात दंगों के बारे में की गई खोजबीन को इस समय सार्वजनिक करने से किसे राजनीतिक फ़ायदा हो सकता है. क्या इस खोजबीन का मकसद गुजरात के भाजपा मुख्यमंत्री को बेपर्दा करना था या कुछ और...

राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखें तो लगता है कि इस ताज़ा ऑपरेशन का नरेंद्र मोदी और भाजपा को नुकसान कम और फ़ायदा ज़्यादा मिलेगा.

उनका कहना है कि इस रिपोर्ट से सामाजिक और सांप्रदायिक स्तर पर ध्रुवीकरण बढ़ेगा और इसका लाभ कट्टरवादी ताकतों को हो सकता है. ज़ाहिर है कि ध्रुवीकरण का हिंदू हितों की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी और राज्य के नेतृत्वकर्ता नरेंद्र मोदी को लाभ मिल सकता है.

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि इसके बाद नरेंद्र मोदी के लिए निजी स्तर पर मुश्किलें बढ़ भी सकती हैं और पार्टी के भीतर और बाहर मोदी के विरोधी उनकी प्रभावी स्थिति पर नैतिकता के आधार पर सवाल उठा सकते हैं.

साथ ही दंगों की जाँच प्रक्रिया में अगर इन बयानों को गंभीरता से लेते हुए कोई क़दम उठाया जाता है तो नरेंद्र मोदी के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होगा.

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