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बर्मा: लोकतंत्र के संघर्ष पर भारत का रुख़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लाल चोगे पहने हज़ारों की संख्या में सड़कों पर बौद्द भिक्षुओं की तस्वीर दुनिया के सामने आई और फिर एक जापानी फ़ोटोग्राफर की गोली मार कर हत्या की तस्वीर.... इन तस्वीरों ने बर्मा के बिगड़ते हालात दुनिया के सामने ला खड़े किए. अंतरराष्ट्रीय समुदाय की तीख़ी आलोचना और दबाव के मद्देनज़र बर्मा के सैन्य शासकों ने इंटरनेट समेत संचार के माध्यमों पर प्रतिबंध लगाए. लेकिन जो आग वहाँ लगी थी उसका धुआँ बाहर दिख चुका था. भारत सरकार ने भी कई दिन स्थिति देखने के बाद चुप्पी तोड़ी. व्यापक सुधारों की माँग की. बातचीत के जरिए समस्या सुलझाने और राष्ट्रीय मेल-मिलाप की माँग की. लेकिन प्रजांतत्र के लिए लड़ रहे और भारत में निर्वासित जीवन जी रहे तिन श्वे का मानना है कि भारत की प्रतिक्रिया बहुत देर से आई और अपर्याप्त थी. उन्होंने कहा, "अगर आप चीन और भारत की तुलना करें तो भारत की प्रतिक्रिया चीन की प्रतिक्रिया के तेरह दिन बाद आई. मुझे नहीं पता कि भारत के विदेश मंत्रालय के अधिकारी क्या सोच रहे हैं, पर उनका बर्मा के बारे में आकलन सच नहीं है." भारत की भूमिका भारत बर्मा का पड़ोसी देश है. भारत को बर्मा में तेल के भंडार, पूर्वोत्तर के पृथकतावादी आंदोलन में बर्मा की भूमिका और वहाँ चीन के बढ़ते दबदबे की चिंता है. दक्षिण एशिया के जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनी कहते है कि ऐसी स्थिति में भारत ने जो भी कहा वह काफ़ी है. वे कहते हैं, "यह सच है कि भारत ने हिंसा की कोई भर्त्सना नहीं की, ना ही भिक्षुओं के समर्थन में कोई बड़ा वक्तव्य दिया. लेकिन मैं समझता हूँ कि यदि भारत ऐसा वक्तव्य देता तो बर्मा के शासकों के साथ भारत के काम करने की जो संभावनाएँ हैं, वो सब ख़त्म हो जातीं. बर्मा के सैन्य शासक ये सब सुनने के आदी नहीं हैं. लोग कहते हैं कि भारत को बर्मा के तेल और गैस में दिलचस्पी है....मैं ये स्पष्ट कर दूँ कि भारत से ज़्यादा अमरीका और फ्रांस की कंपनियों को वहाँ दिलचस्पी है..." बर्मा के प्रजातंत्र समर्थकों का लंबे समय से साथ देते आए पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस कहते हैं, "सबसे पहले तनाशाहों से रिश्ता तोड़ लेना चाहिए. दुनिया के अन्य राष्ट्र जो हमारे नज़दीक हैं उनसे रिश्ता बनाकर आगे बढ़ना चाहिए." लोकसभा के पूर्व स्पीकर और पूर्वोत्तर भारत के जाने-माने नेता पीए संगमा कहते हैं, "अभी जो हो रहा है, भारत सरकार को उसकी भर्त्सना करनी चाहिए. प्रजातंत्र बहाली के लिए जितना संभव हो, भारत सरकार को मदद करनी चाहिए." सैन्य शासन का समर्थन विश्लेषक मानते हैं कि भारत की बर्मा नीति देश की उर्जा, सुरक्षा और सामरिक ज़रूरतों के हिसाब से तय हुई है. उनका कहना है कि 1990 के बाद से ही सैन्य शासन के समर्थन की भारत की जो नीति बनी है वह भी देश हित में हुआ है.
मानवाधिकार कार्यकर्त्ता गौतम नवलखा कहते हैं, "एक-दो लोगों को छोड़ दिया जाए तो हिंदुस्तान में जहाँ पर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा आ जाता है वहाँ पर बहुत सारे लोग चुप हो जाते हैं. दूसरी बात यह है कि हर एक बड़ा देश अपने राष्ट्रीय हित में तानाशाहों का समर्थन करता है. अमरीका का उदाहरण हमारे सामने है." भारत में रह रहे बर्मा के शरणार्थी भारत सरकार से अब भी कड़े रूख़ की उम्मीद करते है. तिन श्वे कहते हैं, "पिछले तीन-चार सालों में किसी भारतीय नेता ने नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की नेता आंग सांग सू ची की रिहाई की माँग नहीं की है. भारत बहुत कुछ कर करता है. उसके पास शक्ति है. ऐसा करना भारत के हितों के विरुद्ध नहीं है. भारत को अपनी बर्मा नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए." लेकिन एसडी मुनी का कहना है, "...दक्षिण एशिया में कहीं भी लोकतंत्र बहाली के विषय में भारत की कोई बढ़-चढ़ कर, सकारात्मक भूमिका नहीं रही है. भारत कभी भी 'अस्थिरता' के हालात का समर्थन कर... अपने सामरिक हितों को ताक़ पर रखकर प्रजातंत्र का समर्थन नहीं करता..." चीन, आसियान और भारत चाहे बर्मा पर दबाव बना सकते हों, पर सभी बस उतनी ही आवाज़ उठा रहे हैं जितना ज़रूरी है. भारत ने तो यहाँ तक कहाँ है कि वह बर्मा पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है. हालांकि उसने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में आंग सान सू ची की रिहाई का समर्थन ज़रूर किया. शरणार्थियों के हालात इस सब के बीच दुनिया भर के विभिन्न इलाकों में बर्मा के शरणार्थी अपने देश के बदलते घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए है. दिल्ली में लगभग दो हज़ार ऐसे शरणार्थी हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा कहते हैं, "भारत में 1800 के क़रीब जो शरणार्थी दिल्ली या बड़े शहरों में रह रहे हैं उन्हीं को मान्यता मिली है. शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र संस्था (यूएनएचसीआर) से मदद भी उन्हीं को मिलती है. लेकिन भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों, ख़ास कर मिज़ोरम में रहने वाले हज़ारों शरणार्थी को मान्यता नहीं मिली है." ये पहली बार नहीं है कि बर्मा में बौद्ध भिक्षुओं ने आंदोलन की राह पकड़ी हो. लेकिन इस बार उनके समर्थक चाहते हैं कि ये आवाज़ें कुचली न जाएँ और बर्मा में व्यापक परिवर्तन आएँ. ये लोग इस पैमाने पर जनता की आवाज़ फिर उठने का दशकों तक इंतज़ार नहीं करना चाहते. |
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