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बर्मा में अशांति: एक छात्र की नज़र से | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्मा के कुछ शहरों में पिछले कई दिन से बौद्ध भिक्षुओं के प्रदर्शन और प्रशासन की कार्रवाई को एक मठ में रहने वाले एक छात्र ने काफ़ी क़रीब से देखा. प्रस्तुत हैं बर्मा के हालात और भिक्षुओं के आंदोलन के बारे में उनके अनुभव: "बर्मा के लोग जिनके दिमाग में हमेशा राजनीति छाई रहती है, आजकल अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं कि अब आगे क्या होगा. अमतौर पर माना जाता है कि बौद्ध मठों में सरकार ने अपने कुछ जासूस छोड़ रखे हैं. इसलिए वहाँ हमेशा संदेह का वातावरण बना रहता है. हर व्यक्ति बहुत सावधानी से बात करता है. इससे पहले आम बातचीत के कारण भी लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. बर्मा में अगस्त में लोगों ने महंगाई का विरोध किया था. ये विरोध भिक्षुओं की आर्थिक स्थिति के कारण था. दरअसल बौद्ध मठों का ख़र्च लोगों द्वारा दिए गए सहयोग से ही चलता है. महंगाई के कारण लोग मठों की मदद करने में असमर्थ हो गए हैं. बौद्ध भिक्षुओं की चिंता थी कि अगर महंगाई इसी तरह बढ़ती रही तो उन्हें खाने के लिए भी कुछ नहीं मिलेगा..... .....पाकोकू में कुछ बौद्ध भिक्षुओं को पीटा गया था जिससे भिक्षु स्तब्ध रह गए. जब उन्होंने रेडियो पर सुना कि बौद्ध भिक्षु रंगून की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं तब उन्हें एहसास हुआ कि देश में कुछ हलचल हो रही है. भिक्षुओं में मतभेद लोग ताज़ा ख़बर जानने के लिए बीबीसी और वॉयस आँफ़ अमेरीका सुनने लगे. घटनाओं और फ़ैसलों पर रेडियो की इन खबरों का असर शायद किसी नेता के नेतृत्व से भी ज़्यादा हुआ. प्रदर्शनों में भाग लेने वाले ज़्यादातर भिक्षु युवा थे, जिन्होंने 1988 का घटनाक्रम नहीं देखा था. उन्हें उम्मीद थी कि उन पर हमला नहीं होगा.
भिक्षुओं के इस आंदोलन से बुज़ुर्ग भिक्षु डरे हुए थे. मठों में उच्च पदों पर आसीन भिक्षु नहीं चाहते थे कि कोई भी प्रदर्शनों में भाग ले..... .....भिक्षुओं की मार-पिटाई की ख़बर से वे हताश, निराश थे. वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक अपना संदेश पहुंचाना चाहते थे. उन्हें चीन, प्रतिबंध और संयुक्त राष्ट्र जैसी बातें सुनाई दे रही थीं, पर वे यह नहीं जानते थे कि इनका मतलब क्या है. इसके बावज़ूद उन्हें आशा थी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय बर्मा में होने वाली हर गतिविधि पर नज़र रख रहा है. 'शुरुआत धार्मिक आंदोलन से' ये घटनाक्रम एक धार्मिक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था. यह कोई व्यवस्थित लोकतांत्रिक आंदोलन नहीं था और इसे ऐसा बनाने का कोई इरादा भी नहीं था. वे जानते थे कि सैन्य शासकों से स्वतंत्रता माँगने का कोई मतलब नहीं है. वे जानते थे कि उनके पास लड़ने के लिए बंदूकें नहीं हैं, लेकिन वे दुनिया को अपने देश के हालात बताना चाहते थे और ये भी बताना चाहते थे कि वे अपनी जान की बाज़ी भी लगा सकते हैं. उन्हें जब यब पता लगा कि संयुक्त राष्ट्र के एक दूत बर्मा आ रहे हैं, तो उनमें उम्मीद की एक किरण जगी, लेकिन उन्हें ये जान कर हैरानी हुई कि संयुक्त राष्ट्र के दूत आकर आंग सान सू ची से मिले. वे आंग सान सू ची का आदर करते हैं लेकिन उन्हें लगा कि इस बार हो रही हलचल उनसे संबंधित थी और संयुक्त राष्ट्र के दूत को उनसे बात करनी चाहिए थी...... .............जब वे सुनते हैं कि प्रदर्शनों के लिए समर्थन घट रहा है और किसी से मदद भी नहीं मिल रही है तो वे निराश होने लगते हैं. उनमें हताशा फैल रही है और वे अंतत: संघर्ष समाप्त कर देंगे." |
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