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गुरुवार, 27 सितंबर, 2007 को 09:42 GMT तक के समाचार
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बर्मा पर भारत की दुविधा और चुप्पी

बर्मा में प्रदर्शनकारी बौद्धभिक्षु
सैनिक सरकार के ख़िलाफ़ भारी संख्या में बौद्ध भिक्षुओं ने हिस्सा लिया है
जब भारतीय पैट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा जब पिछले सप्ताहांत बर्मा के लिए रवाना हुए तो उन्हें दिल्ली में बर्मा के लोकतंत्र समर्थकों के विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा.

बर्मा के लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों ने अपने हाथों में नारे लिखी तख़्तियाँ पकड़ी हुई थीं जिन पर लिखा था - देवड़ा, गैस के लिए बर्मा मत जाओ, लोकतंत्र के लिए वहाँ जाओ. तख़्तियों पर यह भी लिखा था - भारत, बर्मा के सैनिक शासन का समर्थन करना बंद करे.

मुरली देवड़ा जैसे ही बर्मा पहुँचे तो वहाँ सैनिक शासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन तेज़ होने लगे थे. लेकिन भारत ने बर्मा में हुए इन लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों पर अजीब सी चुप्पी साधी हुई है. 1988 के बाद से बर्मा में यह सबसे शक्तिशाली और व्यापक विरोध प्रदर्शन हैं.

1988 में छात्रों का प्रदर्शन भी काफ़ी व्यापक रहा था लेकिन उसे भी क्रूरतापूर्वक दबा दिया गया था.

भारतीय विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को कहा, "भारत बर्मा में राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखे हुए है" लेकिन उस अधिकारी ने साथ ही यह भी कहा, "बर्मा के आंतरिक मामलों में दख़ल देने का हमारा कोई इरादा नहीं है."

लेकिन मुरली देवड़ा की बर्मा यात्रा पर जारी एक सरकारी वक्तव्य में कहा गया है, "मुरली देवड़ा ने ईंधन के क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंधों का दायरा बढ़ाने की संभावनाओं पर बर्मा के ऊर्जा मंत्री ब्रिगेडियर जनरल लून थी के साथ व्यापक विचार विमर्श किया है."

मुरली देवड़ा सोमवार को बर्मा सरकार के साथ अनेक समझौतों पर हस्ताक्षर होते समय मौजूद थे. ये समझौते भारत के तेल और प्रारकृतिक गैस आयोग यानी ओएनजीसी की विदेश शाखा और बर्मा के म्यामाँ तेल और गैस एंटरप्राइज़ के बीच हुए थे.

भारत वापसी पर देवड़ा ने कहा भी था, "ये समझौते दोनों देशों के बीच एक अच्छा क़दम है जो दो पड़ोसी देशों के बीच सहयोग का दायरा बढ़ाने के लिए एक और आधार मुहैया कराता है."

प्राथमिकताएँ

जब बर्मा का सवाल आता है तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के लिए प्राथमिकताएँ बिल्कुल साफ़ हैं ख़ासतौर से ऐसे समय में जब इस देश की बागडोर प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह जैसे एक अर्थशास्त्री के हाथों में है.

यहाँ और वहाँ...
 ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारे देश के अंदर तो लोकतंत्र है और किसी पड़ोसी देश में सैन्य तानाशाह सरकार चलाएँ. भारत को बर्मा में लोकतंत्र बहाल करने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए.
नंदिता हक्सर

अर्थव्यवस्था में तेज़ी से प्रगति कर रहा भारत पड़ोसी देशों में ऊर्जा के संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने की जल्दबाज़ी में नज़र आता है और इनमें बर्मा और ईरान जैसे पड़ोसी देश भी शामिल हैं.

बर्मा के पश्चिमी प्रांत अरकांस में प्राकृतिक गैस के व्यापक भंडार हैं जो भारत जैसे उर्जा चाहने वाले देश के लिए बड़े आकर्षण का केंद्र है.

भारतीय चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स के पूर्व महासचिव नजीब आरिफ़ का कहना है, "यह गैस चीन को नहीं, बल्कि भारत को मिलनी चाहिए. यह पूर्वोत्तर भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है."

भारत सरकार का कहना है कि उसे पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्रोहियों से लड़ाने में बर्मा की मदद मिल रही है क्योंकि अनेक विद्रोहियों के ठिकाने बर्मा में हैं.

भारत के निवर्तमान सेना प्रमुख जनरल जे जे सिंह ने पिछले सप्ताह कहा भी था, "बर्मा के साथ बढ़ती हमारी सैन्य साझेदारी का हम सम्मान करते हैं. भारत ने बर्मा को कुछ सैनिक साज़ोसामान दिया है और आगे और भी दे सकता है."

लेकिन 1980 में भारत ने बर्मा में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का ज़ोरशोर से समर्थन किया था, अपने क्षेत्र में भी और संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी. 1988 में जब बर्मा सरकार ने लोकतंत्र समर्थक आंदोलन पर बल प्रयोग किया था तो उससे बचने के लिए बहुत से लोगों ने भारत में पनाह ली थी.

बर्मा सरकार ने तो भारत सरकार पर यह भी आरोप लगाया था कि वह बर्मा में लोकतंत्र समर्थक अनेक संगठनों और मंचों को धन भी देता रहा है.

लेकिन ऐसे में जबकि कुछ पश्चिमी देश बर्मा पर दबाव बढ़ा रहे हैं और आर्थिक प्रतिबंध लगा और बढ़ा रहे हैं तो भारत ने 1990 के दशक से ही बर्मा की सैनिक सरकार के साथ अपने संबंध और गाढ़े बनाए हैं.

भारत की बर्मा नीति पर पुस्तक लिखने वाले रीने एकहेतीयू का कहना है, "भारत बर्मा में चीन के प्रभाव को कम करने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा है क्योंकि भारत का समस्याग्रस्त पूर्वोत्तर क्षेत्र बर्मा की सीमा से मिलता है. किसी भी अन्य कारण के बजाय यही एक कारण इस स्थिति को स्पष्ट करने में सक्षम है कि 1990 के बाद से भारत की बर्मा नीति में बदलाव क्यों आया है."

भारत अब बंदरगाह, सड़क और रेल पटरियाँ बढ़ा रहा है और बर्मा के तेल और गेस भंडारों के लिए चीन से मुक़ाबला कर रहा है.

ख़ामोशी की आलोचना

भारत में नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और संगठनों ने बर्मा में चल रहे लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों पर भारत की ख़ामोशी की आलोचना की है.

हम नहीं बोलेंगे
प्रणब मुखर्जी
 बर्मा में हमारे कूटनीतिक और आर्थिक हित हैं, हमें जिन्हें बचाना है. बर्मा में लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष करना वहाँ के लोगों का काम है, यह उनका मुद्दा है.
प्रणब मुखर्जी

मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली एक वकील नंदित हक्सर का कहना है, "ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारे देश के अंदर तो लोकतंत्र है और किसी पड़ोसी देश में सैन्य तानाशाह सरकार चलाएँ. भारत को बर्मा में लोकतंत्र बहाल करने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए."

एक वरिष्ठ संपादक सुमीत चक्रवर्ती का कहना है, "भारत की बर्मा नीति दोहरे मानदंडों से भरी हुई है और इसे तुरंत बदला जाना चाहिए."

बर्मा मामलों के जानकार बीबी नंदी का कहना है, "बर्मा की सैनिक सरकार ने भारत के हितों की रक्षा के लिए कुछ नहीं किया है. अराकांस प्रांत से निकाली गई गैस चीन को दे दी गई है. बर्मा सरकार ने भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया है जिस तरह का अभियान भूटान ने 2003 में चलाया था. "

"जुंटा ने भारत को बस यूँ ही समझ लिया है इसलिए ऐसी कोई वजह नहीं है कि भारत बर्मा की सैनिक सरकार का समर्थन करे."

लेकिन भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने दो महीने पहले पूर्वोत्तर के शहर शिलाँग में एक सम्मेलन में देश की बर्मा नीति को सही ठहराया था. उन्होंने कहा था, "बर्मा में हमारे कूटनीतिक और आर्थिक हित हैं, हमें जिन्हें बचाना है. बर्मा में लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष करना वहाँ के लोगों का काम है, यह उनका मुद्दा है."

लेकिन बर्मा पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के हालात में भारत पर भी इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई करने का दबाव बढ़ रहा है.

बीबी नंदी कहते हैं, "भारत को कोई रुख़ अपनाना होगा. सिर्फ़ देखते और इंतज़ार करते रहने से कुछ नहीं होगा."

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