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शनिवार, 15 सितंबर, 2007 को 10:07 GMT तक के समाचार
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हज़ारों उर्दू शिक्षकों की नियुक्तियाँ रद्द

मुलायम सिंह यादव
मुलायम सरकार के फ़ैसले को उन्हीं के कार्यकाल में चुनौती दी गई थी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुलायम सिंह सरकार के फ़ैसले को रद्द करते हुए लगभग 13 हज़ार उर्दू शिक्षकों की भर्ती की अधिसूचना को रद्द कर दिया है.

उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति के लिए सरकार ने योग्यता का मानदंड घटाकर हाईस्कूल और इंटरमीडियट कर दिया था जिसे अदालत में चुनौती दी गई थी.

जस्टिस अरूण टंडन ने अपने फ़ैसले में कहा है कि क़ानूनी दृष्टि से यह फ़ैसला ग़लत था और इसके क्रियान्वयन में पूरी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई.

समाजवादी पार्टी का आरोप है कि सरकार की ओर से इस मामले की पैरवी ठीक ढंग से नहीं की गई.

सरकार और सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

उल्लेखनीय है कि उत्तरप्रदेश में साढ़े 18 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है और मुस्लिम समुदाय से जुड़े हर मसले को राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है.

यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब अभी राज्य सरकार के उस निर्णय पर बहस चल ही रही है जिसमें साढ़े छह हज़ार पुलिसकर्मियों की भर्ती को रद्द कर दिया गया था.

कमज़ोर कड़ियाँ

जब उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी तो कोठारी आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाया गया था जिसमें कहा गया था कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए.

सरकारी आँकड़ों के आधार पर अधिकारियों ने कहा था कि प्रदेश के एक लाख प्राथमिक स्कूलों में से 25 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जहाँ उर्दू मातृभाषा वाले बच्चे पढ़ने आते हैं.

इन आँकड़ों के आधार पर मुलायम सिंह सरकार ने शिक्षकों के रिक्त पदों में से ही उर्दू शिक्षकों के पद सृजित करके इन पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे.

स्कूली छात्र

पहले इस पद के लिए बीए, उर्दू की पात्रता रखी गई थी. लेकिन बाद में सरकार ने महसूस किया कि उर्जू में स्नातक तक की पढ़ाई करने वाले 13 हज़ार उम्मीदवारों का मिलना कठिन होगा और शिक्षकों की योग्यता को घटा दिया गया था.

इस फ़ैसले के बाद हाईस्कूल और इंटर पास लोगों को भी इस पद के लिए आवेदन देने को कहा गया और इसी आधार पर नियुक्तियाँ कर दी गईं.

क़ानून के जानकारों का कहना है कि सरकार की ओर से ग़लती यह हो गई कि शिक्षकों की भर्ती के लिए योग्यता घटाने के लिए उसने शिक्षकों की ट्रेनिंग के लिए स्थापित राष्ट्रीय संस्था एनसीईटी से अनुमति नहीं ली.

याचिका

इस भर्ती प्रक्रिया के विरोध में शंबुल नक़वी ने याचिका दायर कर दी और कहा कि शिक्षकों की भर्ती के लिए योग्यता घटा देने से उन उम्मीदवारों के लिए अवसर कम हो गए तो वास्तव में योग्य थे.

यह याचिका तभी दायर कर दी गई थी जब राज्य में मुलायम सिंह सरकार थी लेकिन इसकी अंतिम सुनवाई अब जाकर हुई है.

सुनवाई के दौरान तर्क दिया गया कि इस नियुक्ति पर इसलिए भी सवाल खड़ा होता है क्योंकि राज्य में उर्दू शिक्षकों के इतने पद स्वीकृत नहीं हैं.

यह भी कहा गया कि जितने शिक्षकों की नियुक्ति हुई है उसकी तुलना में देखें तो उतने प्राथमिक स्कूल राज्य में ऐसे नहीं हैं जहाँ शिक्षा का माध्यम उर्दू हो या जहाँ विषय के रुप में उर्दू पढ़ाई जा रही हो.

हालांकि सरकार की ओर से इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है और न ही सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी ने कुछ कहा है लेकिन सरकार के सूत्रों का कहना है कि सुझाव दिए गए हैं कि इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की जानी चाहिए.

समाजवादी पार्टी का आरोप

उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति का फ़ैसला समाजवादी पार्टी (सपा) के शासन के दौरान किया गया था लेकिन सपा का आरोप है कि सरकार ने अदालत में इस फ़ैसले के पक्ष में ठीक ढंग से पैरवी नहीं की.

सपा नेता अहमद हसन ने आरोप लगाया कि इस मामले में मायावती सरकार ने कोताही बरती है.

उन्होंने कहा, “यह एक जज का फ़ैसला है, इस पर अपील की जानी चाहिए और एक बड़ी पीठ को इसकी सुनवाई करनी चाहिए.”

मुलायम सरकार के इस फ़ैसले को उनके ही कार्यकाल के दौरान अदालत में चुनौती दी गई थी लेकिन फ़ैसला अब आया है.

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