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सुरक्षा व्यवस्था में कहाँ कमी रह जाती है?

हैदराबाद धमाका
हाल में भारत में चरमपंथी हमलों की घटनाएं ख़ासी बढ़ गई हैं
भारत के हैदराबाद शहर में हाल के चरमपंथी हमले के बाद एक बार फिर 'आतंकवाद पर बहस' ने ज़ोर पकड़ लिया है और देश की सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर भी तमाम सवाल उठाए जा रहे हैं.

हैदराबाद अभी मक्का मस्जिद के धमाके के सदमें से उबरा भी नहीं था कि गत 25 अगस्त को एक और हमला हुआ जिसमें 42 लोगों की जान चली गई.

हर बार की तरह संसद में इसे लेकर बहस और हंगामा हुआ लेकिन नेताओं की बयानबाज़ी में कहीं यह कोशिश नहीं दिखी कि चरमपंथ से निपटने के लिए क्या ठोस रणनीति बनाई जाए.

इसके अलावा अख़बारों में चर्चा़ गर्म रही कि दुनिया में 'आतंकवाद' से मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. हमलों के लिए पाकिस्तान और बंगलादेश से संचालित कुछ संगठनों पर उंगलियाँ उठाई गईं.

सरकार ने कहा कि प्रशासन के पास ऐसी सूचनाएं थीं कि हैदराबाद में कोई हमला हो सकता है.

स्रोत

लेकिन इस पर एक आम आदमी के मन में यह सवाल उठता है कि अगर इतना कुछ पता था तो इन हमलों को रोका क्यों नहीं जा सका.

 आतंकवादी हमले अब संयुक्त तौर पर अंजाम दिए जाते हैं, जिसमें पाकिस्तान या बंगलादेश से अलग-अलग लोग आकर निर्देशों के मुताबिक़ अपना काम अंजाम देकर वहां से निकल लेते हैं. एक ही मिशन के लिए काम करते हुए भी यह लोग एक दूसरे से अनजान होते हैं
अजय साहनी

भारतीय खुफ़िया एजेंसी 'रिसर्च एंड एनालिसिस विंग' (रॉ) के अध्यक्ष रह चुके आनंद कुमार वर्मा का कहना है कि गुप्तचर ऐजेंसी कभी भी सौ फ़ीसदी सूचना नहीं दे सकती है.

लेकिन जब यह कहा जाता है कि अमुक घटना के तार पाकिस्तान या बंगलादेश से जुड़े हुए हैं तो मन में यह विचार आता है कि जब कोई पकड़ा ही नहीं गया तो कैसे तय हुआ कि साज़िश के पीछे कौन था.

'इंस्टीट्यूट ऑफ कान्फ़िल्क्ट मैनेजमेंट' के निदेशक अजय साहनी का कहना है, "घटना की जांच से तुरंत पता नहीं चलता कि इसे किसने अंजाम दिया बल्कि पूर्व की घटनाओं और हमलों की विशेष प्रकृति के आधार पर किसी संगठन पर शक ज़ाहिर किया जाता है."

साहनी का कहना है, "आतंकवादी हमले अब संयुक्त तौर पर अंजाम दिए जाते हैं, जिसमें पाकिस्तान या बंगलादेश से अलग-अलग लोग आकर निर्देशों के मुताबिक़ अपना काम अंजाम देकर वहां से निकल लेते हैं. एक ही मिशन के लिए काम करते हुए भी ये लोग एक दूसरे से अनजान होते हैं".

 चरमपंथी हमलों को सौ फ़ीसदी रोक पाना संभव नहीं है. उनका कहना है कि नागपुर के आरएसएस मुख्यालय तथा औरंगाबाद में हमलों को विफ़ल किया गया लेकिन इसकी चर्चा मीडिया में नहीं हुई
सुरक्षा एजेंसियाँ

'द हिंदू' अख़बार के सुरक्षा मामलों के पत्रकार प्रवीण स्वामी का कहना है, "वर्ष 2005 के बाद के चरमपंथी हमलों पर नज़र डालें - चाहें वह दिल्ली के बाज़ार हों, समझौता एक्सप्रेस हो, मुम्बई बम विस्फ़ोट हों या मक्का मस्जिद का हमला, सभी में निचले स्तर के कार्यकर्ता तो पकड़े गए लेकिन मास्टरमाइंड यानी सरगना, हमलों से पहले ही देश से भाग जाने में क़ामयाब रहे."

लेकिन गुप्तचर एजेंसियों का कहना है, "चरमपंथी हमलों को सौ फ़ीसदी रोक पाना संभव नहीं है. उनका कहना है कि नागपुर के राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ (आरएसएस) मुख्यालय तथा औरंगाबाद में हमलों को विफल किया गया लेकिन इसकी चर्चा मीडिया में नहीं हुई."

क्या हो रणनीति

आनंद कुमार वर्मा का आरोप है, "चरमपंथियों को सऊदी आरब जैसे देशों से अथाह पैसा आता है जिस पर रोक लगाए जाने की ज़रूरत है."

वर्मा कहते हैं कि यदि कुछ मदरसों या कुछ मस्ज़िदों में कट्टरपंथी शिक्षा दी जा रही है तो इसे भी रोकना होगा.

 चरमपंथियों को सऊदी आरब जैसे देशों से अथाह पैसा आता है जिस पर रोक लगाए जाने की ज़रूरत है. इसके अलावा यदि कुछ मदरसों या कुछ मस्जिदों में कट्टरपंथी शिक्षा दी जा रही है तो इसे भी रोकना होगा
आनंद कुमार वर्मा, पूर्व रॉ प्रमुख

प्रवीण स्वामी कहते हैं, "चरमपंथी आजकल इंटरनेट तथा सैटेलाइट फोन जैसी आधुनिक संचार तकनीक का इस्तेमाल करते हैं लेकिन हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास तकनीक तथा स्टाफ़ की भारी कमी है".

उन्होंने आधुनिक मशीनों, प्रशिक्षित स्टाफ़, तकनीकी विशेषज्ञों की कमी, खुफ़िया सूचनाओं का विश्लेषण न कर पाने को कमज़ोर कड़ी बताया. इसके अलावा वे राज्य पुलिस तथा अन्य एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी को भी बड़ी कमज़ोरी मानते हैं.

पड़ोसी देश

लेकिन लाख टके का सवाल है कि जब भारत को पता चलता है कि चरमपंथी हमलों के तार पड़ोसी मुल्क़ों से जुड़े हैं तो फ़िर भारत को क्या करना चाहिए?

 चरमपंथी आजकल इंटरनेट तथा सैटलाइट फ़ोन जैसी आधुनिक संचार तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास तकनीक तथा स्टाफ़ की भारी कमी है
प्रवीण स्वामी, पत्रकार

अजय साहनी का कहना है, "पड़ोसी देशों के साथ भारत को सख़्ती से पेश आना होगा. पड़ोसी देशों से व्यापार बढ़ाने तथा उन्हें विशेष दर्जा देने की बजाय इसका उल्टा करना होगा, इन देशों पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाना चाहिए और ऐसी नीति बनानी चाहिए कि पड़ोसी देश मजबूर होकर अपने यहाँ से ऐसी गतिविधियों पर लगाम कसने पर मजबूर हो जाएँ."

हाल में भारत में हुई घटनाओं में बंगलादेश का नाम बार-बार आता है, विश्लेषकों का कहना है कि इसका बड़ा कारण सीमाओं का खुला होना है.

पड़ोसी देशों पर गंभीर आरोप लगाते हुए अजय साहनी कहते हैं, "हम रटी-रटाई भाषा में लश्कर-ए-तैय्यबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे चरमपंथी संगठनों का ही नाम लेते हैं जबकि बंगलादेश से बढ़ते आतंकवाद में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया ऐजेंसी आईएसआई और बंगलादेश की 'डायरेक्टर जनरल फॉर फोर्सेस इंटेलीजेंस' की सांठगांठ है.

 पड़ोसी देशों के साथ भारत को सख़्ती से पेश आना होगा. पड़ोसी देशों से व्यापार बढ़ाने तथा उन्हें विशेष दर्जा देने की बजाय इसका उल्टा करना होगा, इन देशों पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाना चाहिए और ऐसी नीति बनानी चाहिए कि पड़ोसी देश मजबूर होकर अपने यहां से ऐसी गतिविधियों पर लगाम कसने पर मजबूर हो जाएँ
अजय साहनी

पर गूढ़ सवाल है कि भारत क्या हमले झेलता रहेगा या फिर इन्हें रोकने के लिए कोई कदम भी उठाएगा?

प्रवीण स्वामी कहते हैं, "सबसे ज़रूरी है पुलिस व्यवस्था को आधुनिक बनाना. हमारे यहां खुफ़िया विभाग गृह मंत्रालय का हिस्सा है जबकि इसे एक स्वायत्त संस्था होना चाहिए, इसके अलावा देश की आपराधिक न्याय क़ानून व्यवस्था को भी इन मामलों से निपटने में सक्षम बनाना होगा. जिससे अपराधी कानून की कमजोरियों का फायदा न उठा पाएं."

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि आतंकवाद को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, क्योंकि एक सक्षम तथा आधुनिक देश होने के बावजूद अमरीका में ग्यारह सितंबर के हमलों को नहीं रोका जा सका था लेकिन फिर भी हाथ पर हाथ रखे तो नहीं बैठा जा सकता.

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