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बढ़ रही है मुशर्रफ़ की मुसीबत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की मुश्किलें ख़त्म होने के बदले बढ़ती जा रही हैं. नवाज़ शरीफ़ की वतन वापसी के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला उनके लिए एक और झटका है. दरअसल, इस तरह के कई फ़ैसले पहले भी आए हैं जिनसे यही संकेत जाता है कि राष्ट्रपति के तौर पर परवेज़ मुशर्रफ़ ने जो फ़ैसले किए हैं वे क़ानून और संविधान की दृष्टि से ग़लत हैं. परवेज़ मुशर्रफ़ एक फौजी जनरल हैं जो तख़्तापलट करके राष्ट्रपति पद पर आए हैं इसलिए उनके लिए वैधता का संकट हमेशा रहा है, इस फ़ैसले से वह संकट और गहरा गया है. जुलाई महीने में जब इफ़्तेख़ार चौधरी लंबी लड़ाई लड़कर वापस अपने पद पर आए तो लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब मुशर्रफ़ को सुप्रीम कोर्ट से परेशानी के सिवा कुछ और नहीं मिलेगा. ऐसा लग रहा है कि लोगों का क़यास ग़लत नहीं था. पाकिस्तान में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ फ़िलहाल कोई नहीं दिख रहा है, सिवाय सेना के. उसके बारे में भी गहरे अंतर्विरोध बने हुए हैं. अक्सर सुना जाता है कि पाकिस्तान में सेना में मुशर्रफ़ का विरोध करने वाले लोगों को तादाद काफ़ी अधिक है लेकिन सेना के अंदर कोई खुलकर बात नहीं करता इसलिए इन बातों का पता नहीं चल पाता. यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि परवेज़ मुशर्रफ़ की पकड़ सेना पर कितनी मज़बूत है या नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि पिछले कुछ समय की घटनाओं का असर मुशर्रफ़ के सहयोगी सैनिक अफ़सरों पर न पड़ा हो, ऐसा असंभव है. अनुमान तो यही लगाया जा सकता है कि सेना के अंदर भी परवेज़ मुशर्रफ़ की पकड़ उसी तरह कमज़ोर हुई है जिस तरह बाक़ी देश पर. रास्ता अब सवाल ये है कि परवेज़ मुशर्रफ़ को इस संकट से कौन उबार सकता है, क्या ऐसा हो सकता है कि किसी राजनीतिक दल के समर्थन से वे अपने उखड़ते पाँव जमा सकें. परवेज़ मुशर्रफ़ इस समय चौतरफ़ा संकट से घिरे हैं और उन्हें संकट से कोई उबार सकता है तो वो विपक्षी सियासी पार्टियाँ ही हैं. ये वही पार्टियाँ हैं जिसके नेताओं को मुशर्रफ़ ने देश से निकाल दिया था वही अब मुशर्रफ़ मौजूदा मुसीबत से उबार सकते हैं. कुछ लोगों का कहना है कि मुशर्रफ़ के पास एक विकल्प है कि वे सैनिक शासन लागू कर दें, इस विकल्प से कोई इनकार नहीं कर सकता लेकिन उसके बारे में कोई भविष्यवाणी भी नहीं की जा सकती. मार्शल लॉ तो रातोरात कभी भी लगा दिया जाता है और अगली सुबह नागरिकों को पता चलता है कि वे सैनिक शासन में जी रहे हैं. |
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