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बुधवार, 22 अगस्त, 2007 को 17:57 GMT तक के समाचार
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'परमाणु समझौते पर आगे बढ़ेगा भारत'
जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे और मनमोहन सिंह
जापान ने भारत से और बेहतर संबंधों की उम्मीद जताई है
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संकेत दिए हैं कि अमरीका के साथ परमाणु समझौते को लेकर पैदा हुए राजनीतिक गतिरोध के बावजूद भारत इस दिशा में आगे बढ़ेगा.

साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई है कि परमाणु समझौते को लेकर जिस तरह का राजनीतिक गतिरोध भारत में क़ायम हुआ है, उसमें से कोई रास्ता निकाल लिया जाएगा.

भारतीय प्रधानमंत्री ने यह बात जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे के साथ दिल्ली में बुधवार को एक संयुक्त पत्रकार वार्ता में कही.

उन्होंने यह भी उम्मीद जताई है कि परमाणु समझौते के मसले पर जब भारत नाभिकीय आपूर्ति समूह (एनएसजी) में जाएगा तो वहाँ जापान भारत का समर्थन करेगा.

ग़ौरतलब है कि जापान एनएसजी के 45 सदस्य देशों में से एक है और भारत को जापान का समर्थन भारत के हित में हो सकता है.

इससे पहले जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भारतीय संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि जापान और भारत के रिश्ते महत्वपूर्ण हैं और जापान इन्हें और प्रगाढ़ करने का इच्छुक है.

गतिरोध को जवाब

भारतीय प्रधानमंत्री के इस ताज़ा बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं और जानकार इसे पिछले कुछ दिनों से परमाणु समझौते पर क़ायम गतिरोध के जवाब के तौर पर देख रहे हैं.

 प्रधानमंत्री ने राजनीतिक गतिरोध पर सीधे असंतुष्टों से बातचीत करने के बजाए जापान प्रधानमंत्री के साथ पत्रकारों को संबोधित करते हुए यह बयान देकर एक स्पष्ट संकेत दे दिया है कि भारत सरकार इस समझौते पर आगे बढ़ने जा रही है
ज्योति मल्होत्रा, वरिष्ठ भारतीय पत्रकार

प्रधानमंत्री ने परमाणु समझौते पर आगे बढ़ने की बात ऐसे समय में कही है जब वामदलों की ओर से लगातार यह दोहराया जा रहा है कि परमाणु समझौते के मुद्दे पर क़ायम गतिरोध को ख़त्म करने के लिए बातचीत तभी शुरू हो सकती है जब भारत सरकार इस समझौते पर फिलहाल पूरी तरह से रोक लगाए.

वरिष्ठ पत्रकार ज्योति मल्होत्रा इस बाबत कहती हैं, "प्रधानमंत्री ने राजनीतिक गतिरोध पर सीधे असंतुष्टों से बातचीत करने के बजाए जापान प्रधानमंत्री के साथ पत्रकारों को संबोधित करते हुए यह बयान देकर एक स्पष्ट संकेत दे दिया है कि भारत सरकार इस समझौते पर आगे बढ़ने जा रही है."

ग़ौरतलब है कि वामदल अमरीकी हाईड एक्ट के तहत परमाणु समझौते को लेकर लगातार अपनी आपत्ति जताते आ रहे हैं और उनका कहना है कि भारत सरकार इस समझौते पर अपनी स्थिति स्पष्ट करके ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (आईएईए) और एनएसजी से बातचीत करे.

ऐसे में प्रधानमंत्री का यह बयान एनएसजी के सदस्य देश, जापान के प्रधानमंत्री के साथ आना कई राजनीतिक संकेत दे रहा है.

सरकार का भविष्य

जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री के इस ताज़ा बयान के बाद यूपीए और वामदलों के बीच का गतिरोध और बढ़ता नज़र आ रहा है.

वामपंथी नेता
वामदल परमाणु समझौते के मौजूदा स्वरूप का विरोध कर रहे हैं

इस वक्त वामदलों की केंद्रीय स्तर की बैठक चल रही है और वे परमाणु करार पर भारत सरकार के किसी भी क़दम को बारीकी से देख रहे हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री का यह बयान यूपीए गठबंधन का संकट बढ़ा सकता है.

विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री की ओर से यह संकेत दिया जाना कि सरकार परमाणु करार पर आगे बढ़ेगी, के बाद राजनीतिक गतिरोध ख़त्म होने के सीमित विकल्प रह जाते हैं.

अब अगर इस बयान के बाद भारत सरकार आईएईए के पास जाता है तो वामदल सरकार को अपना समर्थन जारी रखेंगे, इस बात की संभावना कम ही है.

ऐसे में या तो केंद्र सरकार के पास देश में नए चुनाव कराने की घोषणा की जा सकती है और या फिर वामदलों के समर्थन के बिना अल्पमत सरकार किसी तरह से देश और सरकार को आगे चलाने की कोशिश करेगी.

भारत की भूमिका

जानकार इस पूरे गतिरोध और इस दौरान जापान के प्रधानमंत्री की यात्रा को लेकर और भी पहलू समझाते हैं.

मसलन, जहाँ एक ओर कुछ विश्लेषकों का मानना है कि परमाणु समझौते पर इतनी दूरी तक आगे बढ़ने के बाद अगर भारत सरकार पीछे लौटती है तो इससे भारत की साख़ पर भी असर पड़ सकता है.

वहीं जापानी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने पर सहमति के साथ यह भी साफ़ हो रहा है कि एशिया में चीन-पाकिस्तान-उत्तर कोरिया के समीकरण को संतुलित करने के की दिशा में भारत की एक महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही है.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एसडी मुनि कहते हैं कि जापान की पहल को केवल जापान ही नहीं, बल्कि अमरीका और अन्य देशों की इच्छा के तौर पर भी देखना चाहिए जो एशिया में चीन के सापेक्ष एक संतुलन चाहते हैं.

ख़ुद चीन भी भारत की भूमिका को नकार नहीं सकता और आज की स्थितियों में एशिया में किसी भी प्रकार का गठबंधन भारत को शामिल किए बिना पूरा नहीं हो सकता है.

उधर पाकिस्तान की ओर से इस परमाणु समझौते के विरोध के स्वर सुनाई देते रहे हैं पर जानकार मानते हैं कि चीन के लिए भी केवल पाकिस्तान के साथ चलना संभव नहीं होगा और अंदरूनी तौर पर संबंध कैसे भी हों पर आईएईए और एनएसजी में इसे मान्यता मिलने की संभावना कम ही है.

शिंज़ो आबेभारत-जापान के बहाने..
क्या जापान, भारत और अमरीका चीन के ख़िलाफ़ गुट बनाना चाहते हैं?
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