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शुक्रवार, 03 अगस्त, 2007 को 00:47 GMT तक के समाचार
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परमाणु समझौते पर सरगर्मी तेज़
भारत परमाणु संयंत्र
इस दिशा में जुलाई 2005 में राष्ट्रपति बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अहम कदम उठाए
भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर विपक्षी नेताओं को विश्वास में लेने की कोशिशों के तहत भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने गुरुवार को विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को इस बारे में जानकारी दी है.

माना जाता है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौते के प्रावधान 123 पर हुई सहमति के बारे में आडवाणी को जानकारी दी गई है.

मीडिया में अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस समझौते के प्रावधान 123 के बारे में जानकारी जल्द ही भारतीय और अमरीकी विदेश मंत्रालय की वेबसाइटों पर सार्वजनिक की जा सकती है.

पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी पार्टी के सहयोगी और पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, राजनाथ सिंह और अरुण शौरी को इस समझौते के बारे में जानकारी दी थी.

उस दौरान लालकृष्ण आडवाणी सिंगापुर की यात्रा पर थे.

भाजपा कहती रही है कि वह परमाणु समझौते के प्रारूप के अध्ययन के बाद ही अपनी व्यापक प्रतिक्रिया देगी.

ग़ौरतलब है कि इससे पहले भारत सरकार की ओर से ये कहा गया था कि समझौते का प्रारूप 10 अगस्त से शुरू होने जा रहे संसद सत्र में रखा जाएगा.

अहम समझौता

मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश
राष्ट्रपति जॉर्ज बुश इस समझौते को अपनी विदेश नीति की एक अहम सफलता मानते हैं

लंबी बातचीत के बाद मार्च 2006 में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने अपनी भारत यात्रा के दौरान परमाणु सहमति पर हस्ताक्षर किए थे.

इसके बाद इस समझौते को अमरीकी संसद में क़ानून बदलने से लेकर भारत में चली गंभीर चर्चाओं का लंबा रास्ता तय करना पड़ा.

असैनिक मकसदों के लिए भारत और अमरीका के बीच बनी परमाणु सहमति के मुताबिक भारत को अमरीका से परमाणु ईंधन, रिएक्टर और तकनीक मिल सकेगी.

भारत को अपने सैन्य और असैनिक परमाणु रियक्टरों को अलग-अलग करना होगा और अपने कई परमाणु संयंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों के लिए खोलने होंगे.

लेकिन अब भी समझौता कुछ दूर दिखता है क्योंकि इसे अमरीकी संसद की मंज़ूरी चाहिए होगी.

हालांकि भारत में इसकी कोई ज़रुरत नहीं होगी लेकिन भारत सरकार को परंपराओं के अनुरूप संसद को विश्वास में लेना होगा.

अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश इस परमाणु समझौते को अपनी विदेश नीति की एक बड़ी सफलता मानते हैं और चाहते हैं कि जनवरी, 2009 में उनका कार्यकाल ख़त्म होने से पहले यह समझौता लागू हो जाए.

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