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शुक्रवार, 27 जुलाई, 2007 को 13:26 GMT तक के समाचार
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परमाणु समझौते के मसौदे को हरी झंडी

मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश
वर्ष 2005 में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे
अमरीका ने कहा है कि भारत के साथ हुए असैनिक परमाणु समझौते के मसौदे पर बातचीत पूरी हो गई है. समझौते के बाद भारत को अमरीका से परमाणु ईंधन और उपकरण मिल सकेंगे.

अमरीका ने कहा है कि 123 परमाणु समझौते के तहत अब भारत ऊर्जा के लिए इस्तेमाल किए हुए ईंधन का दोबारा इस्तेमाल कर सकेगा.

लेकिन भारत फिर से परमाणु परीक्षण करता है तो किसी भी अमरीकी राष्ट्रपति को ये अधिकार होगा कि वो भारत को दी गई परमाणु मदद वापस ले ले.

वाशिंगटन में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए अमरीका के उप विदेश मंत्री निकोलस बर्न्स ने कहा है कि परमाणु ईंधन दोबारा इस्तेमाल करने के लिए भारत को बिल्कुल आधुनिक तकनीक से बना एक संयंत्र स्थापित करना होगा और वो संयंत्र अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में रहेगा.

माना जा रहा है कि ये प्रावधान उन अमरीकी आशंकाओं को दूर करेगा जिनमें कहा जा रहा था कि भारत उर्जा के लिए इस्तेमाल किए हुए ईंधन को हथियार बनाने के काम में ला सकता है.

इस समझौते की दूसरी सबसे बड़ी रूकावट के बारे में बताते हुए बर्न्स ने कहा कि उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है.

 दोनों देशों के बीच असैनिक परमाणु सहयोग से सामरिक और आर्थिक लाभ मिलेंगे. इससे ऊर्जा के क्षेत्र में भी मदद मिलेगी और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत मिल पाएँगे
साझा बयान

यानि यदि भारत फिर से परमाणु परीक्षण करता है तो किसी भी अमरीकी राष्ट्रपति को इसका अधिकार होगा कि वो भारत को दिए परमाणु संयंत्र, तकनीक और ईंधन वापस ले लें.

लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी कहा, "ये समझौता इसी उम्मीद के साथ किया गया है कि कभी इस तरह की नौबत नहीं आए."

निकोलस बर्न्स ने ये भी कहा है कि 2006 में राष्ट्रपति बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच हुए समझौते के तहत भारतीय परमाणु संयंत्रों को ईंधन की आपूर्ति हमेशा जारी रहेगी.

जब भारत ने 1974 में परमाणु परीक्षण किया था तो अमरीका ने तारापुर परमाणु संयंत्र के लिए ईंधन की आपूर्ति रोक दी थी और संयंत्र मुश्किलों में घिर गया था. भारत ने अपनी इस चिंता को इस समझौते में दूर करने की पूरी कोशिश की है.

फ़ायदा

इस समझौते के और फ़ायदों को गिनाते हुए अमरीकी उप विदेश मंत्री ने कहा है कि इससे भारत परमाणु अप्रसार के दायरे में आ जाएगा, भारत में इस्तेमाल हो रही उर्जा में साफ़ सुथरी उर्जा का प्रतिशत बढ़ जाएगा, और उसे अपनी उर्जा ज़रूरतों के लिए इरान जैसे देशों पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा.

राष्ट्रपति बुश ने दोनों ही देशों की टीमों को इस समझौते को यहां तक पहुँचाने के लिए बधाई दी है.

उन्होंने कहा है, "ये समझौता दुनिया के एक अग्रणी देश भारत के साथ हमारे संबंधों को मज़बूत करने की दिशा में एक और बड़ा क़दम है."

अब भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से अपने संयंत्रों के रख-रखाव और सुरक्षा की हरी झंडी लेनी होगी और परमाणु आपूर्ति समूह के 45 देशों की भी सहमति लेनी होगी जिसके बाद ये समझौता अमरीकी कांग्रेस के सामने आख़िरी बार पेश होगा.

लेकिन इस बीच कांग्रेस के 23 सदस्यों ने राष्ट्रपति बुश को एक पत्र लिखकर कहा है कि यदि ये समझौता पहले पारित किए गए हाइड एक्ट के दायरे से बाहर हुआ तो फिर वो कांग्रेस से ज़्यादा उम्मीद नहीं रखें.

परमाणु ठिकानों की निगरानी पर बातचीत बाक़ी है

यानि अभी इस समझौते के आख़िरी शब्द के लिखे जाने में कई बाधाएँ बाकी हैं.

अमरीका की विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने इस समझौते को 'ऐतिहासिक' कहा है. एक बयान में उन्होंने कहा, "भारत और अमरीका ने शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग के समझौते पर बातचीत पूरी कर ली है. यह समझौता ऐतिहासिक है."

बुधवार को ही भारत में कैबिनेट ने इस समझौते के मसौदे को मंज़ूरी दी थी.

इस समझौते के तहत 30 साल बाद भारत को पहली बार अमरीका परमाणु ईंधन दे सकेगा. भारत को परमाणु उपकरण भी मिल पाएँगे. हालाँकि भारत परमाणु अप्रसार संधि में शामिल नहीं है.

अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस और भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी की ओर से जारी साझा बयान में कहा गया है- दोनों देशों के बीच असैनिक परमाणु सहयोग से सामरिक और आर्थिक लाभ मिलेंगे. इससे ऊर्जा के क्षेत्र में भी मदद मिलेगी और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत मिल पाएँगे.

बयान में कहा गया है कि राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असैनिक परमाणु सहयोग का जो वादा किया था, उस दिशा में यह बातचीत काफ़ी अहम थी. जो अब पूरी हो गई है.

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