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तलवार की धार पर मुशर्रफ़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस्लामाबाद की लाल मस्जिद पर सैन्य कार्रवाई और इसमें बड़ी संख्या में चरमपंथियों के मारे जाने की घटना ने पाकिस्तान और उसके नेतृत्व को तलवार की धार पर बिठा दिया है. एक गलत फ़ैसला, पाकिस्तान को स्थाई तौर पर अराजक हिंसा के दौर में धकेल सकता है. अल क़ायदा और पाकिस्तान के दूसरे भूमिगत चरमपंथी संगठन लाल मस्जिद पर सैन्य कार्रवाई के बदला लेने के लिए पहले ही राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़, उनके मंत्रियों और सेना को निशाना बनाने का संकल्प जता चुके हैं. इसी साल अप्रैल में गृह मंत्री आफ़ताब शेरपाओ ऐसे ही आत्मघाती हमले में बाल-बाल बचे थे. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की हत्या की कई साजिशों का भी पूर्व में पर्दाफाश हो चुका है. लाल मस्जिद पर कमांडो कार्रवाई के बाद से सूबा सरहद में चरमपंथियों और आत्मघाती हमलों में कोई 50 सैनिक मारे गए हैं. विकल्प खुद कमांडो रह चुके जनरल मुशर्रफ़ ने ज़ोर देकर कहा है कि सभी चरमपंथी गुटों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी और किसी भी मदरसे को सरकारी आदेश की अवहेलना की अनुमति नहीं दी जाएगी. उन्होंने हज़ारों सैनिकों को सूबा सरहद के स्वात इलाके में भी भेजा है. इस इलाके में पाकिस्तान के तालेबानी और अल क़ायदा चरमपंथी शरीयत क़ानून लागू करना चाहते हैं. मुशर्रफ़ की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं. एक ओर जहाँ वह सैन्य शासन से आजिज़ आ चुके वकीलों और पेशेवरों के आंदोलन का सामना कर रहे हैं, वहीँ विपक्षी पार्टियाँ भी उनके ख़िलाफ़ लगातार एकजुट हो रही हैं. मुशर्रफ़ पर निष्पक्ष और भयमुक्त चुनाव की जल्द से जल्द घोषणा का भारी दबाव है. साथ ही उन्हें अपनी भावी राजनीतिक भूमिका के बारे में भी निर्णय लेना है. हालाँकि मुशर्रफ़ वर्ष 2001 से ही बार-बार इस्लामिक कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की बात करते रहे हैं, लेकिन वह इसमें नाकाम रहे. इस बार हालात बदले हुए हैं और जनरल मुशर्रफ़ खुद मान रहे हैं कि स्थिति बेहद गंभीर है. अब तक जनरल मुशर्रफ़ तालेबान के कथित ‘शरीयत राज्य’ के ख़िलाफ़ सीधी जंग से बचते रहे हैं. रणनीतिक चाल राष्ट्रपति के एक नज़दीकी सलाहकार का कहना है कि जब मुशर्रफ़ ने खुद को संकट या राजनीतिक भंवर में पाया तब उन्होंने ये ‘रणनीतिक चाल’ चली.
सलाहकार का कहना है, “राजनीति और दुनिया को देखने का जरनल का यह ख़ास नज़रिया है.” अब ये लग रहा है कि मुशर्रफ़ के पास क़दम वापस खींचने की गुंजाइश नहीं बची है. उनके पास कुछ ही विकल्प बचे हैं. या तो वो कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई जारी रखें या एक बार फिर उन्हें शांत या ख़ुश करने की कोशिश करें. अगर उन्होंने बाद वाला विकल्प चुना तो यह पाकिस्तान के भविष्य के लिए बेहद ख़तरनाक होगा. 9/11 के बाद 9/11 की घटना के बाद से ही मुशर्रफ़ पर आतंकवाद के मसले पर दोहरा मानदंड अपनाने के आरोप लगते रहे हैं. कहा जाता है कि एकतरफ वो आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग में पश्चिम के साथ खड़े हैं, वहीं अफ़ग़ानिस्तान, भारत और अमरीका को ‘ब्लैकमेल’ करने के लिए कट्टरपंथियों का भी साथ दे रहे हैं. मुशर्रफ़ को सत्ता सँभाले लंबा अरसा हो गया है, लेकिन उन्होंने अभी तक सेना और इस्लामिक कट्टरपंथियों के बीच तीन दशक पुरानी सांठगांठ तोड़ने की कोई कोशिश नहीं की. इसी का नतीजा रहा कि अल क़ायदा को पाकिस्तानी के कबायली इलाकों में एकजुट होने का मौका मिल गया. अफ़ग़ानिस्तान के तालेबानियों के लिए बलूचिस्तान सुरक्षित शरणस्थली बन गई और पाकिस्तानी कट्टरपंथियों को उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान के पश्तून बहूल क्षेत्र में अपना दुष्प्रचार करने का मौका मिल गया. अगर मुशर्रफ़ कट्टरपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई का रास्ता चुनते हैं तो इसके लिए उन्हें देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का समर्थन हासिल करना होगा, जो इतना आसान नहीं है. लेकिन यदि वह कट्टरपंथियों को मनाने के दूसरे विकल्प पर चलते हैं तो इसका सीधा मतलब विवादों का नया पिटारा खोलना और प्रशासन की ताकत और विश्वसनीयता को दाँव पर लगाने जैसा होगा. |
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