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रविवार, 24 जून, 2007 को 09:05 GMT तक के समाचार
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कलाम चाहते हैं पहले पेज पर कार्टून
राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम
राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम कार्टून को पहले पन्ने पर देखना चाहते हैं
राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की भारतीय मीडिया को सलाह है कि कार्टून को अख़बारों के पहले पेज पर वापस लाया जाना चाहिए क्योंकि इससे लोगों को सुबह मुस्कुराने का मौक़ा मिलता है.

राष्ट्रपति कलाम ने कहा है कि अख़बार के पहले पन्ने पर राजनीति की ख़बरों को कम किया जाना चाहिए.

वे अख़बारों के स्थानीय हो जाने को लेकर भी चिंतित दिखाई देते हैं.

लेकिन कार्टूनिस्ट और संपादक दोनों अलग-अलग कारणों से मानते हैं कि कार्टून का पहले पेज पर लाया जाना इस समय संभव नहीं दिखता.

मुस्कुराने का मौक़ा’

राष्ट्रपति ने एक समाचार एजेंसी पीटीआई के मुख्यालय में पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “जब आप पहले पेज पर कार्टून देखते हैं तो आपके चेहरे पर मुस्कुराहट आती है. इसे देखकर पुरुष, महिला और बच्चे सभी ख़ुश होते हैं. आपको कार्टून को पहले पेज पर वापस लाना चाहिए.”

उन्होंने कहा कि आमतौर पर पहले पेज पर ख़बरें हत्या, चोरी और बलात्कार की होती हैं.

पहले पेज पर कार्टून
 जब आप पहले पेज पर कार्टून देखते हैं तो आपके चेहरे पर मुस्कुराहट आती है. इसे देखकर पुरुष, महिला और बच्चे सभी ख़ुश होते हैं. आपको कार्टून को पहले पेज पर वापस लाना चाहिए
एपीजे अब्दुल कलाम

राष्ट्रपति ने सलाह दी, “किसी महिला या पुरुष को सुबह मुस्कुराने का मौक़ा दीजिए. उन्हें सुबह नाख़ुश मत कीजिए.”

उन्होंने अपने युवावस्था को याद करते हुए कहा कि जब वे अख़बार उठाते थे तो पहली चीज़ जो वे देखते थे वो कार्टून होता था.

कलाम ने कहा कि हो सकता है कि संपादकों को राजनीतिक ख़बरें अच्छी लगती हों लेकिन लोग इससे घृणा करते हैं.

राष्ट्रपति कलाम ने अख़बारों के स्थानीय हो जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि अख़बारों को राजधानी दिल्ली से बाहर की ख़बरों को भी देखना चाहिए.

इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पंजाब में काली बेन नदी की लोगों ने मिलकर सफ़ाई की, लेकिन उसकी ख़बर नहीं बनी. उनका कहना था, “यमुना देश की अकेली नदी नहीं है जो प्रदूषित हो गई है.”

‘असहमति की जगह घटी’

लेखक और और दैनिक हिंदुस्तान के कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोड़पकर मानते हैं कि कार्टूनों का पहले पेज से ग़ायब हो जाना न केवल भारत में हुआ बल्कि पूरी दुनिया में हुआ है.

 यह समझने की ज़रुरत है कि भारतीय समाज राजनीति में रचा-बसा है और राजनीति उनके रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करता है, इसलिए लोग राजनीति में ख़ासी रुचि लेते हैं
राजेंद्र धोड़पकर

उन्होंने अमरीका का एक उदाहरण देते हुए बताया कि हाल ही में एक अख़बार को छँटनी करनी पड़ी तो एक ऐसे कार्टूनिस्ट को भी बाहर कर दिया गया जो दो बार पुलित्ज़र पुरस्कार जीत चुका था.

इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं, “इस समय दुनिया में वैश्वीकरण और फ़ीलगुड का दौर चल रहा है जिसमें आलोचना और असहमति की जगह ख़त्म हो गई है.”

उनका कहना है कि कार्टून मूल रुप से असहमति और आलोचना का एक माध्यम है.

राजेंद्र धोड़पकर मानते हैं कि यह एक सामाजिक परिवर्तन है जो पाँच-सात-दस सालों तक चलेगा और फिर जब वैश्वीकरण का दौर धीमा पड़ेगा तो लोगों को फिर पहले पेज पर कार्टून की ज़रुरत महसूस होगी.

राष्ट्रपति कलाम की इस टिप्पणी पर कि राजनीतिक समाचार संपादकों की पसंद हैं लोगों की नहीं. धोड़पकर कहते हैं, “ऐसा नहीं है. यह समझने की ज़रुरत है कि भारतीय समाज राजनीति में रचा-बसा है और राजनीति उनके रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करता है, इसलिए लोग राजनीति में ख़ासी रुचि लेते हैं.”

वे कहते हैं कि इसके अलावा राजनीति भारतीय समाज में फ़िल्म और क्रिकेट की तरह मनोरंजन का एक साधन है. लोग राजनीतिक ख़बरों और गतिविधियों से मज़ा लेते हैं. इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि राजनीति की ख़बरों से लोग घृणा करते हैं.

राजेंद्र धोड़पकर स्वीकारते हैं कि अख़बारों में स्थानीय ख़बरों की भरमार हो गई है लेकिन वे मानते हैं कि यह सिर्फ़ राजधानी के अख़बारों में नहीं हुआ है, पूरे देश में अख़बारों का स्थानीयकरण बढ़ा है.

‘बाँधा नहीं जा सकता’

अमर उजाला के समूह संपादक शशि शेखर का मानना है कि राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम अख़बारों के सुधि पाठक हैं और कार्टून पर उनके सुझाव का स्वागत किया जाना चाहिए.

 ऐसा नहीं है कि अख़बारों में सिर्फ़ हत्या, लूट और बलात्कार की ख़बरें छपती हैं. हम इसे सामाजिक बुराई की तरह देखते हैं और उसी के दायरे में इन्हें अख़बारों में जगह मिलती है. लेकिन अख़बारों में दूसरी ख़बरें भी बहुत होती हैं.
शशि शेखर

लेकिन वे ख़बरों को लेकर उनके सुझावों से असहमति जताते हुए कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि अख़बारों में सिर्फ़ हत्या, लूट और बलात्कार की ख़बरें छपती हैं. वे कहते हैं, “हम इसे सामाजिक बुराई की तरह देखते हैं और उसी के दायरे में इन्हें अख़बारों में जगह मिलती है. लेकिन अख़बारों में दूसरी ख़बरें भी बहुत होती हैं.”

वे कहते हैं कि एक तो अख़बारों का आकार घट रहा है और दूसरी ओर विज्ञापन बढ़ रहे हैं ऐसे में अख़बार के पहले पेज को किसी तरह बाँधा नहीं जा सकता. वे कहते हैं, “कार्टून हो या न हो हमारा अख़बार और दूसरे लगभग सभी अख़बार ख़बरों के थकाऊपन को दूर करने वाली सामग्री देने की कोशिश कर रहे हैं.”

राजनीतिक ख़बरों को संपादक की पसंद बताने वाले राष्ट्रपति कलाम के बयान पर शशि शेखर कहते हैं, “मुझे आश्चर्य है कि कलाम साहब ने ऐसा कहा.”

वे कहते हैं कि सच यह है कि बहुत से अख़बारों से राजनीति की ख़बरें पहले पेज से धकेल कर भीतर के पन्नों पर भेजी जाने लगी हैं. वे अपने अख़बार का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अब हमारे अख़बारों में राजनीतिक बयान अठारहवें-बीसवें पेज पर छपते हैं, पहले पेज पर नहीं.

अख़बारों की बढ़ती स्थानीयता के सवाल पर वे कहते हैं कि कलाम साहब ने एक अख़बार के हॉकर की तरह अपना जीवन शुरु किया था लेकिन तब से अब तक अख़बार की दुनिया बहुत बदल गई है.

उनका कहना है, “यह कहना सही नहीं होगा कि अख़बारों में स्थानीय ख़बरें ही छपती हैं. जिस ख़बर का उदाहरण उन्होंने दिया है उसे हमने व्यापक जगह दी थी और फिर देश की कई नदियों की स्थिति ज़ाहिर करने वाली ख़बरें छापकर नदियों को बचाने की मुहिम छेड़ने की वकालत की थी.”

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