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टिनटिन चला गाँव की ओर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में जिन कार्टून किरदारों ने अपनी ख़ास जगह बनाई है उसमें टिनटिन का नाम काफ़ी लोकप्रिय है. बेल्जियम का ये रिपोर्टर किरदार पिछले 75 सालों से लोगों का मनोरंजन करता आया है. अंग्रेज़ी भाषा में तो टिनटिन की कॉमिक्स और डीवीड भारत में कई सालों से बिकती आई हैं लेकिन अब ग्रामीण इलाक़ों के लिए पहली बार टिनटिन के कारनामे हिंदी की वीडियो कैसेट और डीवीडी के तौर पर बाज़ार में उतरे हैं. हिंदी में डीवीडी उतारने के पीछे सिर्फ़ कार्टून किरदार की लोकप्रियता ही एकमात्र कारण नहीं है बल्कि बाज़ार के समीकरण भी इसके पीछे काम कर रहे हैं. मीडिया आलोचक साइबल चैटर्जी कहते हैं, “अंग्रेज़ी में आप कम लोगों तक पहुँच पाते हैं. हिंदी के इस्तेमाल से ज़्यादा उपभोक्ताओं तक पहुँचा जा सकता है.” 75 रुपए की ये डीवीडी ज़्यादातर उत्तरी भारत के कस्बों और गाँवों में बेची जा रही है. इस हिंदी डीवीडी की अच्छी बिक्री से वितरक भी हैरान हैं. वितरक अमित चढ्ढा ने बताया, “ बिक्री काफ़ी अच्छी है. डेढ़ महीने में ही हमने 40 हज़ार डीवीडी बेची हैं.” दरअसल भारत के ग्रामीण इलाक़े अब नए बाज़ार के रूप में उभर रहे हैं. बड़ी बड़ी कंपनियाँ अब उन लोगों को निशाना बना रही हैं जिन्हें पहले ग़रीब और अनपढ़ समझ कर दरकिनार कर दिया जाता था. टिनटिन का किरदार 1929 में जॉर्ज्स रेमी ने सृजित किया था. उसके बाद से 45 भाषाओं में इसकी करोड़ों किताबों बिक चुकी हैं. टिनटिन और उसके साथी किरदारों- वफ़ादार कुत्ता स्नोवी और कैप्टन हैडोक ने पिछले कई सालों से लोगों का भरपूर मनोरंजन किया है. |
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