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पेड़ लगाने वाली आम महिला की ख़ास कहानी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के पूर्वी राज्य उड़ीसा की रहने वाली उर्मिला बेहरा ने पिछले 15 सालों में एक लाख से भी अधिक पेड़ लगाकर पेड़ों के प्रति श्रद्धा और पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया है. उर्मिला कोई पर्यावरणविद नहीं हैं. 'ग्लोबल वार्मिंग' और 'ग्रीन हाउस गैस' के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. लेकिन एक चीज़ वह बहुत अच्छी तरह से जानती और समझती हैं कि पेड़ मनुष्यों और धरती के लिए बहुत ही लाभकारी और ज़रूरी हैं. इसलिए पेड़ लगाने को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है. आसपास के इलाकों में वो 'गछ माँ' के नाम से जानी जाती हैं. पेड़ लगाने के अपने शौक के बारे में 48 वर्षीया उर्मिला बेहरा कहती हैं, "मुझे एक बेटे की बड़ी चाह थी लेकिन ईश्वर ने मुझे दो बेटियाँ ही दीं. तब मैंने अपने आंगन में एक पौधा लगाया और उसे बेटे की तरह प्यार दिया. इससे मुझे बहुत संतोष मिला. यह 1992 की बात है. आगे चलकर पेड़ लगाना मेरी ज़िंदगी का मकसद बन गया." पेड़ों को प्यार
उड़ीसा के बालेश्वर ज़िले के कोठपड़ा गांव में रहने वाली उर्मिला आज भी पेड़-पौधों को बेटे समान ही मानती हैं. आज भी उनका दिन अपने आंगन के किसी पौधे से प्यार जताने के बाद ही शुरू होता है. सुबह नहाकर वो किसी एक पौधे पर काजल और हल्दी लगाती हैं. उर्मिला रोज़ाना कम से कम दस पौधे लगाती हैं. विशेष अवसरों पर यह संख्या 100 पार कर जाती है. कोठपड़ा गांव के पूर्ण बारिक कहते हैं, "पिछले 15 सालों में आसपास की पांच पंचायतों में 'गछ माँ' ने अनगिनत पेड़ लगाए हैं. वो हर पेड़ को अपने बच्चे जैसा प्यार देती हैं. घर के आंगन से शुरू हुआ पेड़ लगाने का यह सिलसिला अब आसपास के 50-60 गांवों में फैल चुका है. आसपास के किसी गांव में जाने पर वहाँ आपको उर्मिला के कई 'बेटे' मिल जाएंगे. उर्मिला अधिकतर ऐसे पेड़ लगाती हैं जो या तो छांव, फल और फूल देते हैं या फिर किसी और तरह से आदमी के काम आते हैं जैसे आम, जामुन, नारियल, खजूर, नीम, साल, सागौन और ताड़ के पेड़. ताड़ के पेड़ वो मुख्य रूप से खेतों में लगाती हैं. उनका मानना है कि इससे खेतों में काम करने वाले किसानों को आसमान से गिरने वाली बिजली से सुरक्षा मिलती है. उर्मिला पेड़ लगाने के बाद उन्हें भूल नहीं जातीं. वो तब तक पेड़ों की देखभाल करती हैं जब तक पेड़ बड़ा नहीं हो जाता और उसका पशुओं का चारा बनने का ख़तरा पूरी तरह से टल नहीं जाता. उर्मिला कहती हैं,"पेड़ों को बढ़ते हुए देखना किसी इंसान के बच्चे को बड़ा होते हुए देखने के समान है. इससे मुझे बहुत संतोष मिलता है." निजी प्रयास उर्मिला के शौक का सबसे अहम पहलू यह है कि खुद ग़रीब होने के बावजूद उन्होंने इस काम के लिए सरकार या किसी संस्था से एक पैसा भी नहीं लिया है. इसी वजह से उन्हें कुछ साल पहले अपनी जमीन का एक हिस्सा बेचना पड़ा. अब उनके पास एक एकड़ से भी कम जमीन बची है. यह शौक पालना उर्मिला और उनके पति पीतांबर बेहरा के लिए बहुत मंहगा साबित हुआ है. लेकिन उन्हें इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है. इस काम में उर्मिला को अपने पति का पूरा समर्थन और सहयोग मिला है. पीतांबर कहते हैं, "जब तक हम जीवित हैं पेड़ लगाते रहेंगे." पीतांबर का दर्शन भी निराला है, "बेटा बड़ा होकर चोर, डाकू या हत्यारा बन सकता है. लेकिन पेड़ ऐसा नहीं करता. वो हमेशा देता है, किसी से कुछ भी लेता नहीं है." अपने परिवार के गुजारे के लिए उर्मिला और उनके पति ने साल के पत्तों से प्लेट और कटोरियाँ बनाने की एक मशीन लगा रखी है. उर्मिला से यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें कभी अपना काम करते हुए विरोध का सामना करना पड़ा तो उर्मिला एक मजेदार किस्सा सुनाती हैं. वो बताती हैं, "एक बार पास के गांव में पेड़ लगाते समय वहाँ के लोगों ने इसका विरोध किया. हमने उस समय उनसे कोई तर्क नहीं किया. लेकिन देर रात जब सब सो रहे थे तो हम दुबारा वहा गए और पौधा लगाया. सुबह उठकर गांव वालों ने पौधे देखे. लेकिन किसी ने उन पौधों को नहीं उखाड़ा." सहयोग यह किस्सा कई साल पुराना है. अब उर्मिला ने अपनी निष्ठा और लगन से आसपास के गांवों के लोगों का विश्वास और समर्थन पूरी तरह से जीत लिया है. अब तो दर्जनों लोग उनके काम में हाथ भी बँटाने लगे हैं. इनमें से ही एक हैं दरा गांव के दीनबंधु महापात्र. जेल की सजा काट चुके दीनबंधु के जीवन में उर्मिला से मिलने के बाद बहुत बड़ा बदलाव आया. अब वे उर्मिला के वृक्षारोपण कार्यक्रम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. इसी तरह अपनी ढलती उम्र के बावजूद अब्दुल अहमद खान और गगन किस्कू भी अपना पूरा समय इसी काम में लगाते हैं. उर्मिला के सहयोगियों की संख्या अब 50-60 तक पहुँच गई है. पेड़ लगाने के काम को अधिक व्यापक और कारगर ढंग से करने के लिए उर्मिला के समर्थकों ने 'वृक्ष माँ समिति' का गठन किया है. समिति के सचिव अशोक बेहरा कहते हैं,"हमने आसपास की छह पंचायतों के सभी रास्तों के किनारे पेड़ लगाने का काम शुरू किया है. लेकिन आज भी हर काम उर्मिला की अगुआई में होता है. हर पौधा वही लगाती हैं." | इससे जुड़ी ख़बरें आर्सेलर-मित्तल को उड़ीसा में हरी झंडी21 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस किसानों को भा रही है हर्बल खेती15 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस घरेलू कलह ने दी पेड़ पर शांति27 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस राखी बाँधकर पेड़ों की रक्षा का जनांदोलन21 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस बोधि वृक्ष की टहनी 'काटने' का विवाद21 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस 'चिनार' को बचाने के लिए भूख हड़ताल31 मई, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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