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राखी बाँधकर पेड़ों की रक्षा का जनांदोलन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पेड़ों की रक्षा के लिए उत्तराँचल में चले चिपको आंदोलन को कौन नहीं जानता. पेड़ों को बचाने के लिए ये लोग पेड़ों से लिपट जाया करते थे. लेकिन झारखंड के हज़ारीबाग ज़िले के लोगों ने पेड़ों की रक्षा के लिए एक नया तरीका खोज निकाला है. वे पास के जंगल के पेड़ों को राखी बाँधते हैं और फिर उनकी रक्षा करते हैं. इसका राखी के त्योहार से कोई लेना-देना नहीं है. किसी भी दिन पेड़ का रक्षाबंधन किया जाता है और फिर पेड़ सुरक्षित हो जाते हैं. पूजा-अर्चना का तरीका जब हम एक गाँव के भीतर पहुँचे तो सुधाकुमारी का स्वर सुनाई दिया, "लाल-ला फूलवा तो तोहरे सिंदुरवा," यानी पेड़ों पर लगने वाले लाल रंग के फूल तुम्हारा सिंदूर हैं. सुधाकुमारी राखी बाँधकर पेड़ों की रक्षा करनेवाले आंदोलन की सक्रिय सदस्या हैं और गाँव में गाना गा-गाकर लोगों में पेड़ों को बचाने के लिए जागरूकता पैदा करती हैं. हज़ारीबाग के इन गाँवों में इस जनाँदोलन ने जागरूकता पैदा कर दी है. धरमपुर गाँव के किसान सुरेंद्र प्रसाद यादव कहते हैं, "पेड़ रहेगा तो मनुष्य रहेगा, पेड़ नहीं रहेगा तो मनुष्य भी नहीं रहेगा, जीवन के लिए पेड़ होना ज़रूरी है." हमने उनसे पूछा, "क्या आपने कभी पेड़ नहीं काटे." जवाब में वो कहते हैं, "पहले मैंने भी पेड़ काटे हैं पर जब से मैं वन्य प्रणी सुरक्षा समिति से जुड़ा हूँ, मुझे प्रेरणा मिली है और मैं अब पेड़ नहीं काटता." हज़ारीबाग के लोगों के इस अभियान के प्रणेता हैं दुधमटिया गाँव के अध्यापक महादेव महतो. हमने उनसे पूछा कि आख़िर राखी बाँधकर पेड़ों को बचाने की ज़रूरत क्यों पड़ी? वे बताते हैं, "1990 से हम प्रयास कर रहे हैं कि पेड़ों को कटाई से बचाया जा सके. इसके लिए हमने गाँवों में जाकर लोगों के साथ मीटिंग कीं पर कुछ वर्षों के बाद जब पेड़ तैयार हो जाते थे तो लोग उन्हें काटने लगते थे." उन्होंने बताया, "मैंने सोचा कि जब तक लोगों को इससे भावनात्मक रूप से नहीं जोड़ेंगे, तबतक लोगों में सही जागरूकता नहीं आएगी और फिर भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए पूजा-अर्चना का यह तरीका अपनाया." हज़ारीबाग के गाँवों की महिलाएँ रक्षाबँधन से वन रक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, बिल्कुल उत्तराँचल की महिलाओं की तरह. जब हमने गाँव की कुछ महिलाओं से बात की तो उन्होंने बताया, "हम पेड़ों को बचाने की पूरी कोशिश करते हैं. लोगों को बताते हैं कि इन्हें मत काटो. हम धूमधाम से पेड़ों के रक्षाबँधन का कार्यक्रम मनाते हैं और प्रसाद भी बाँटते हैं." सज़ा गाँव की महिलाएँ बताती हैं कि जो लोग पेड़ों को काटेंगे, उनको सज़ा दी जाएगी. पर क्या सारे पेड़ कटने से बच जाते हैं, पूछने पर एक अन्य महिला बताती हैं,"पेड़ तो कटते ही हैं, जिसको ज़रूरत होती है, वो तो पेड़ काटता ही है पर हाँ, जिन पेड़ों में रक्षा बँधा होता है, उन्हें नहीं काटा जाता है." कई मामलों में झारखंड का यह वन रक्षा आँदोलन महाराष्ट्र के वनराई और उत्तराँचल के देववनों जैसा ही है जहाँ वनों को आस्था से जोड़ना उनके लिए अच्छा साबित हुआ है. लेकिन इस आँदोलन से कितना फ़र्क पड़ा है, पूछने पर महतो बताते हैं, "राखी बाँधने का यह आंदोलन सबसे पहले सात अक्टूबर, 1990 को दुधमटिया के वनों से शुरू हुआ था और तब से यह लगातार बढ़ ही रहा है और अभी तक 20 से भी ज़्यादा गाँवों का रक्षाबँधन हो चुका है." विडम्बना यह है कि राखी बाँधकर ज़गल बचानेवाले इन गाँवों में पेड़ों का नामोनिशान नहीं है. तेज़ भूप में तपती झोपड़ियाँ छाँव को तरसती हैं. ऐसा क्यों, पूछने पर तुलसी बताते हैं, “वन कहाँ से होगा जब लोगों ने पेड़ काटकर घर बना लिए.” ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या महादेव महतो का वन प्रणी रक्षा अभियान पर्यावरण की रक्षा कर पाएगा या फिर पर्यावरण संरक्षण के तमाम अन्य प्रयोगों की तरह इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा. महादेव महतो इसके जवाब में बताते हैं, “मैं अगर किसी गाँव के कार्यक्रम में नहीं पहुँच पाता हूँ तो ऐसा नहीं होता है कि वहाँ कार्यक्रम नहीं होता है. लोग उसी तरह से पेड़ों की पूजा करते हैं और उनको राखी बाँधते हैं. मुझे नहीं लगता कि मेरे मरने के बाद यह अभियान ख़त्म हो जाएगा.” अगर महादेव महतो अपने आँदोलन को जन आँदोलन बना पाने में सफ़ल हो जाते हैं तो हज़ारीबाग के बाग न सही, पर जंगलों को ज़रूर बचाया जा सकेगा. सवाल महिला शक्ति और समाज की दूरदृष्टि के बने रहने का है. |
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