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शुक्रवार, 01 जून, 2007 को 07:02 GMT तक के समाचार
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'अमिताभ के नाम ज़मीन आवंटन फर्ज़ी'

अमिताभ बच्चन
इसी ज़मीन के आधार पर अमिताभ ने मुंबई में फार्महाउस के लिए भू आवंटन कराया था
फ़ैज़ाबाद की एक अदालत ने बाराबंकी में ग्रामसभा की ज़मीन बॉलीवुड स्टार अमिताभ बच्चन के नाम पर दर्ज करने को फ़र्ज़ी करार दिया है.

प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि अमिताभ को राजस्व कोर्ट से दोषी पाए जाने के बाद अब उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाया जा सकता है.

फ़ैजाबाद के अपर आयुक्त विद्यासागर प्रसाद ने अपने आदेश में कहा कि अमिताभ बच्चन के नाम पर ज़मीन की 'एंट्री' फ़र्ज़ी और धोखाधड़ी है.

उन्होंने कहा कि बाराबंकी के ज़िला मजिस्ट्रेट ने 24 मार्च 2006 को अमिताभ बच्चन के नाम से ज़मीन दर्ज किए जाने को रद्द करने का आदेश दिया था, वो न्यायोचित है.

हेरा-फेरी

बाराबंकी जिला प्रशासन के दस्तावेज़ों के मुताबिक 11 जनवरी 1983 की तारीख़ में ग्रामसभा की ज़मीन को अमिताभ बच्चन के नाम पर दर्ज हुआ दिखाया गया है.

यह कारनामा दस्तावेजों में छेड़छाड़ करके पिछले साल मार्च में किसी समय किया गया जब अमिताभ के पारिवारिक मित्र मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे.

ग़ौरतलब है कि बच्चन परिवार इस भू-खंड के बारे में दावा करता है कि यह उनकी खेती की ज़मीन है और इस आधार पर वे किसान हैं.

पर स्थानीय प्रशासन ने पिछले वर्ष इस ज़मीन को परती की ज़मीन घोषित करते हुए बच्चन परिवार के उस दावे को खारिज कर दिया था और कहा था कि यह भूखंड बच्चन परिवार का नहीं है.

बाद में अमिताभ बच्चन की ओर से इस बारे में फ़ैज़ाबाद के अतिरिक्त आयुक्त के यहाँ एक याचिका दायर की गई थी.

विवाद

दरअसल, इस विवाद की शुरुआत होती है पुणे में बच्चन परिवार की ओर से एक आठ हेक्टेअर की ज़मीन को ख़रीदने की कोशिश से. पुणे के पास स्थित इस मवाल क्षेत्र में ज़मीन ख़रीदने के लिए ख़रीददार का किसान होना ज़रूरी है.

ज़मीन से संबंधित विवाद से जया बच्चन भी जुड़ी हुई हैं

बच्चन परिवार यहाँ पर एक फ़ार्म हाउस बनाना चाहता था. ख़ुद को किसान बताने के लिए उन्होंने जो काग़ज़ात जमा किए उनमें बताया गया था कि अमिताभ बच्चन बाराबंकी में एक भूखंड के मालिक हैं जो कृषि कार्य में इस्तेमाल होती है. ज़मीन के दस्तावेज के मुताबिक 11 जनवरी, 1983 से अमिताभ इस ज़मीन के मालिक हैं.

इस दस्तावेज़ को जाँच के लिए संबंधित अधिकारी ने बाराबंकी के कलेक्टर के कार्यालय भेजा. तत्कालीन कलेक्टर ने इसकी जाँच की और पाया कि यह बात मूल दस्तावेजों में बाद में दर्ज की गई थी.

जाँच में यह भी कहा गया कि जिस स्याही से अमिताभ का नाम सरकारी कागज़ों में दर्ज है वो नई है और लिखावट भी दूसरी है. इसके बाद संबंधित लेखपाल को बर्ख़ास्त कर दिया गया और इसे फ़र्ज़ी चकबंदी घोषित करते हुए निरस्त कर दिया गया.

यह भी आरोप लगे कि अमिताभ को इस मामले में राज्य की तत्कालीन सरकार से अच्छे संबंधों के चलते यह लाभ मिला.

हालांकि बाद में कलेक्टर बदलने के बाद अमिताभ को कुछ राहत मिली और उन्हें इस मामले में पेश होकर अपनी बात रखने का मौका दिया गया.

वैसे इसी ज़मीन को लेकर एक और विवाद भी बच्चन परिवार के साथ जुड़ा है. वर्ष 2006 में जब जया बच्चन ने राज्यसभा सदस्यता के लिए अपना नामांकन दाखिल किया था तो उसके साथ जमा किए गए संपत्ति के ब्यौरे में इस ज़मीन का उल्लेख नहीं था.

इस मामले पर चुनाव आयोग में एक याचिका दायर है जिस पर सुनवाई हो रही है.

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