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'1857 हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय संसद के केंद्रीय कक्ष में 1857 के विद्रोह की 150वीं वर्षगांठ पर एक समारोह आयोजित किया गया है और अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि इस विद्रोह ने भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम की थी. समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, उपराष्ट्रपति भैंरों सिंह शेखावत, लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, सांसद और कुछ पूर्व प्रधानमंत्री भी मौजूद थे. जहाँ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विद्रोह के दौरान की सांप्रदायिक एकता पर ज़ोर दिया वहीं का ज़िक्र किया. वहीं राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा कि सच्ची आज़ादी का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है. उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ने इस आज़ादी की पहली जंग बताते हुए कहा कि 1857 से लेकर 1947 तक की कीमती विरासत को संभालकर रखने के लिए एक राष्ट्रीय संग्रहालय बनाया जाना चाहिए. संसद के केंद्रीय कक्ष में आयोजित समारोह के दौरान चर्चित गीतकार गुलज़ार, गायक जगजीत सिंह और गायिका शुभा मुदगल ने नज़मों, ग़ज़लों, गीतों और कविताओं के ज़रिए 1857 के विद्रोह से जुड़ी यादों को कुरेदा. 'भारतीय जीवनशैली का बचाव' प्रधानमंत्री ने कहा कि लगभग सौ सिपाहियों ने जिस विद्रोह की शुरुआत की वह देखते ही देखते राष्ट्रीय स्तर पर फैल गया जिसे दबाने में ब्रिटिश हुक़ूमत को लगभग सौ साल लगे. उनका कहना था, "1857 के विद्रोही विदेशी हुक़ूमत से स्वतंत्रता पाने के लिए... और अपने दीन और धर्म की रक्षा करने के लिए लड़े. हमें उन घटनाओं को 'धर्म की संकीर्ण परिभाषा' के मुताबिक देखने की ग़लती नहीं करनी चाहिए. विद्रोही भारतीय जीवनशैली को बचाने के लिए लड़े क्योंकि उन्हें डर था कि ब्रितानी हस्तक्षेप उसे नष्ट कर रहा है. कार्ल मार्क्स और बेंजामिन डिजरैली ने भी स्वीकार किया कि यह 'राष्ट्रीय विद्रोह' से कम नहीं था." प्रधानमंत्री ने कहा, "महत्वपूर्ण ये है कि दीन और धर्म के नाम पर एकजुट होने के बावजूद विद्रोहियों में एकता थी. विदेशी राज के विरोध के बारे में हिंदू और मुसलमान विभाजत नहीं थे. उस समय जो भी इश्तहार आए उसमें हिंदुओं और मुसलमानों से एकजुट होकर ब्रिटिश सत्ता को हटाने की अपील की गई. विद्रोह भारत में हिंदू-मिस्लिम एकता की मिसाल कायम करता है." मनमोहन सिंह ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की लेखनी का हवाला देते हुए कहा कि 'ब्रिटिश शासन ने विद्रोह दबाने के लिए धार्मिक आधार पर फूट डालने की कोशिश भी की लेकिन वे नाकाम रहे' और इतिहासकारों के शोध ने इस बात को सही साबित किया है. उन्होंने विद्रोह में भागीदारी करने वालों को याद करते हुए कहा, "भले ही उनका संघर्ष राष्ट्रवाद की आधुनिक परिभाषा के दायरे में नहीं आती हो लेकिन ये उनकी वीरता को कम नहीं करता." राष्ट्रपति का आह्वान इस मौके पर राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा कि 'सच्ची आज़ादी का सपना साकार नहीं हुआ है.' कलाम ने कहा, "हम बहुदलीय गठबंधन की चुनौतियों से जूझ रहे हैं जिससे आप ज़्यादा वाकिफ़ होंगे. इससे कैसे निपटें ये सोचना होगा. भ्रष्टाचार, शासकीय पारदर्शिता और निरंतर विकास सुनिश्चित करना होगा. मत भूलिए, आम आदमी को आत्मविश्वास से लबरेज करने का रास्ता राष्ट्रीय नेतृत्व से निकलता है." उनका कहना था कि कई चुनौतियों का समाना करना है जिसमें अनेक पार्टियों के गठबंधन की सरकारों की प्रक्रिया भी है जिसका विकास दो दलीय प्रणाली के रूप में होना चाहिए. राष्ट्रपति कलाम ने कहा कि आर्थिक विकास की तेज़ गति और पहले की उपलब्धियों पर गदगद होने के बज़ाए मौजूदा चुनौतियों से निपटने की तैयारी करनी चाहिए. उनका कहना था, "संसद और राज्य के विधानमंडलों को राष्ट्रीय समृद्धि के मिशन-2020 को पूरा करने के लिए संकल्प लेना चाहिए. वो ये कि हम शहरों और गाँवों की खाई पाट देंगे, सामाजिक समानता कायम करेंगे, किसी भी सूरत में मेधावी छात्रों को पीछे नहीं रहने देंगे और पानी जैसे संसाधनों की पहुँच सभी लोगों तक होगी." विश्व पटल पर भारत की भूमिका के बारे में महर्षि अरविंद के विचारों को दोहराते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि ज़रूरत न्यायसंगत विश्व व्यवस्था कायम करने की है. |
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