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बुधवार, 09 मई, 2007 को 13:40 GMT तक के समाचार
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पहले विद्रोह पर दक्षिण की दावेदारी

दयानिधि मारन और करुणानिधि
टिकट जारी करते वक़्त करुणानिधि ने कहा था विद्रोह को मान्यता देना जरूरी है
ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ भारत में पहली बग़ावत कब हुई? ज़्यादातर इतिहासकारों और भारत सरकार के मुताबिक 1857 में, लेकिन ऐसा नहीं है कि हर कोई इससे सहमत हो.

तमिलनाडु की सरकार का मानना है कि ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ सैनिकों ने पहला विद्रोह 10 जुलाई, 1806 को ही कर दिया था. यानी कि चर्चित सिपाही विद्रोह से 51 साल पहले ही.

तमिलनाडु सरकार इसे आंकड़ों को लेकर इतनी अधिक आश्वस्त है कि इसकी 200 वीं वर्षगांठ पर साल भर पहले एक डाक टिकट भी जारी कर चुकी है. इस टिकट पर लिखा है 'पहला सैनिक विद्रोह'.

इसके मुताबिक तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से तकरीबन सवा सौ किलोमाटर की दूरी पर स्थित वेलोर के किले से पहली बार बग़ावत का बिगुल बजा था.

तमिलनाडु सरकार के इस तर्क को दक्षिण भारत में इतिहासकारों का भी समर्थन मिला था. यहाँ इतिहासकारों का मानना था कि जब भी भारतीय इतिहास की बात होती है तो उत्तर हिस्सा दक्षिण में घटित घटनाओं की अनदेखी कर देता है.

एक शिकायत ये भी है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी दक्षिण भारतीयों की भूमिका की न तो पहचान की गई और न ही उसके रिकॉर्ड हैं.

उनके अनुसार वेलोर का विद्रोह पहली नियोजित बग़ावत थी जो कि ब्रिटिश सेना के भारतीय सिपाहियों ने की थी.

किले पर कब्ज़ा

वर्ष 1799 में टीपू सुल्तान की मौत के बाद ब्रिटिश सेना ने उनके परिवार के सदस्यों को वेलोर के किले में गिरफ़्तार कर लिया.

वर्ष 1806 में भारतीयों सौनिकों के लिए नए ड्रेस कोड लागू किए गए जिसके मुताबिक उनके अपनी जाति के प्रतीक कुंडल पहनने और दाढ़ी बढ़ाने तक पर पाबंदी लगा दी गई.

इसके बदले सैनिकों को एक पगड़ी पहनने के लिए दिया गया जिसमें चमड़े का प्रयोग किया जाता था.

ज़्यादातर भारतीय सैनिक इससे नाराज़ हो गए. मई 1806 को मद्रास में ब्रिटिश सेना के अधिकारियों को भारतीय सैनिकों में धीरे-धीरे बढ़ती जा रही नाराज़गी के बारे में पता चला.

उन्होंने कुछ सैनिकों की पहचान कर उन्हें सार्वजनिक रूप से कोड़े मारने के आदेश दिए और कुछ को नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया. हालांकि इससे विद्रोह की सुलग रही आग शांत नहीं हुई.

वेलोर का किला
वर्ष1806 में भारतीय सैनिकों ने वेलोर के किले पर कब्ज़ा कर लिया था

सैनिक 9 जुलाई को टीपू सुल्तान की बेटी की शादी के बहाने वे वेलोर के किले में जमा हुए.

चेन्नई के इतिहासकार एस मुथैया के अनुसार क़रीब 1500 सैनिकों ने सुबह तीन बजे विद्रोह कर दिया. किले में तैनात 350 यूरोपीय सैनिकों मे से सौ से भी अधिक मारे गए और सुबह होते-होते विद्रोही सैनिको ने किले पर कब्ज़ा कर लिया.

जीत के जश्न मे भारतीय सैनिक एक ग़लती कर बैठे और किले का मुख्य दरवाजा ठीक से बंद करना भूल गए.

मद्रास से पहुँची घुड़सवार सेना ने वहाँ ज़बर्दस्त मार-काट की. साढ़े तीन सौ भारतीय विद्रोही सैनिक मारे गए और लगभग इतने ही घायल हो गए. किले पर फिर से ब्रिटिश सेना के कब्ज़ा हो गया.

ब्रिटिश सेना के अधिकारियों को लगा कि मैसूर की राजकुमारी ने विद्रोहियों को उकसाया है लिहाजा उन्हें कलकत्ता भेज दिया गया.

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