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टीबी की मार से अभिशप्त एक गाँव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मध्य प्रदेश के शिवपुरी ज़िले में मझेरा ऐसा अभिशप्त गाँव है जहाँ एक-दो नहीं बड़ी संख्या में विधवा महिलाएँ हैं और वजह है उनके पतियों का क्षय रोग यानी टीबी का शिकार होना. कमला की उम्र महज़ 23 साल है, पर उसकी मांग सूनी है. यही हाल 40 साल की भागवती का है, जिनके पति सुरेश की भी अकाल मौत हो चुकी है. आनंदी बाई 47 साल की है और उनके पति रामलाल भी अब इस दुनिया में नही है. इस गाँव में ये ही सिर्फ़ तीन अभागी महिलाएँ नहीं है, जिन्होंने अपना पति खो दिया है, बल्कि कई महिलाएँ हैं जिनके जीवन साथी अब इस दुनिया में नहीं हैं. ख़ास बात ये है कि इन सब की मौत की वजह टीबी है. इस गाँव में ऐसी 42 विधवाएँ हैं जिनके पति इस बीमारी के कारण अपनी जान गँवा चुके हैं. ग़रीबी की मार जन अधिकार मंच के ज़िला संयोजक के रूप में काम करने वाले केएस मिश्रा कहते है, "ये सभी सहरिया आदिवासी हैं और इनके लिए ज़िंदगी बहुत ही मुश्किल भरी है. जीवन यापन के लिये ये अवैध खदानों में काम करते है. समुचित खानपान के अभाव में ये टीबी जैसी बीमारी की चपेट में आसानी से आ जाते है और उपचार के अभाव में दम तोड़ देते है." इस क्षेत्र में काम कर रहे ग़ैर सरकारी संगठनों की मानें तो पूरे गाँव में 92 विधवा महिलाएँ हैं. इन महिलाओं की उम्र 20 से लेकर 52 साल तक है. इन आदिवासियों के लिए कई सरकारी योजनाएँ हैं, लेकिन इनका लाभ इन लोगों तक नहीं पहुँच पाया है. सरकारी अस्पतालों में इस बीमारी के उपचार के लिए मुफ़्त दवाएँ उपलब्ध हैं, मगर इन अस्पतालों तक पहुँचना और इलाज कराना कतई आसान नहीं है. इस गाँव में जाकर देखें तो पता चलता है कि ये लोग हर वक़्त किसी न किसी रूप में शोषण के शिकार होते है. इस क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते है, "इन लोगों के लिए दो वक़्त का खाना जुटा पाना भी मुश्किल है. टीबी की दवाई लेकर आ भी जाएँ तो अच्छे खानपान के अभाव में दवाएँ असर नहीं करती हैं. ऊपर से दवाई लेने में लापरवाही की कीमत इन्हें अपनी जान के रूप में चुकानी पड़ती है." लापरवाही यही वजह है कि यह गाँव अब 'विधवाओं के गाँव' के रूप में कुख्यात हो गया है. इस क्षेत्र की बात करें तो सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़ यहाँ पर 883 टीबी के मरीज़ है, जबकि पूरे प्रदेश में यह आँकड़ा 2,29,627 है. टीबी से जूझ रहे रामजीलाल कहते है, " सरकारी काम में भी हमें तय मज़दूरी नहीं मिलती है. अगर विरोध करते हैं तो ठेकेदार बाहर से लोगों को लाकर काम कराने की धमकी देता है. इस डर से लोग कम पैसों में ही काम के लिए तैयार हो जाते हैं." शिवपुरी के ज़िला क्षय अधिकारी डाँ आरके जैन का कहना है कि आमतौर पर इस क्षेत्र के लोग या तो देसी इलाज़ में विश्वास करते है या फिर डॉट्स के तहत दी जाने वाली दवाई को पूरा नही लेते है. टीबी की अधूरी दवाई समस्या को और बढ़ा देती है. डॉटस के तहत मरीज़ को दवा एक दिन छोड़कर दी जाती है. गाँव में रहने वाली गणेशी बाई को दवा बाँटने की ज़िम्मेदारी दी गई है. मगर समस्या ये है कि जीवनयापन के लिए उन्हें ख़ुद सुबह-सबेरे मज़दूरी के लिए निकलना होता है. इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मरीज़ों को दवा उपलब्ध कराने का कैसा इंतज़ाम है. | इससे जुड़ी ख़बरें अब मध्य प्रदेश में बर्ड फ़्लू का मामला29 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस अस्पताल या अजन्मे बच्चों का मुर्दाघर!19 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस पोलियो के सौ नए मामलों से हड़कंप25 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस शादी के लिए एचआईवी टेस्ट अनिवार्य19 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस ग्राहक बता रहे हैं एड्स से बचने के उपाय14 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस वेश्याओं को बाँटे जाएँगे महिलाओं के कंडोम14 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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