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चुनाव में मीडिया की भूमिका पर चर्चा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मीडिया की भूमिका पर एक जीवंत बहस बीबीसी हिंदी ऑनलाइन ने लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में आयोजित की. जहाँ वक्ताओं ने इस बात की प्रशंसा की कि बीबीसी हिंदी सेवा ने विश्वसनीयता बरक़रार रखी है, वहीं चुनाव के दौरान एक्ज़िट पोल, भविष्यवाणी और विज्ञापन के रूप में समाचार छपवाने पर चिंता व्यक्त की गई. बहस की शुरुआत करते हुए राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर आशुतोष मिश्रा ने कहा कि ख़बरों की आपाधापी में राजनीतिक मुद्दों का विश्लेषण नहीं पा रहा है. डॉक्टर मिश्रा ने कहा कि चुनाव प्रचार के पारंपरिक तरीके समाप्त हो रहे हैं और अब सारा दारोमदार मीडिया पर है. बहस में हस्तक्षेप करते हुए वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पंकज ने कुछ उदाहरण दिए कि किस तरह मीडिया ने भविष्यवाणी कर दी और वह ग़लत साबित हुई. उनका कहना था कि ख़बरों के मामलों में तथ्यों से छेड़छाड़ कर अपनी मंशा नहीं थोपनी चाहिए.
बीबीसी के उत्तर प्रदेश संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी ने कहा चुनावों के दौरान मुख्य और जनता से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए. उनका कहना था कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों का संतुलित कवरेज करते हुए अपनी तटस्थता और निष्पक्षता हर हाल में बरक़रार रखनी चाहिए. बीबीसी हिंदी ऑनलाइन की संपादक सलमा ज़ैदी ने छात्रों के सामने एक प्रस्तुतिकरण किया जिसमें उन्होंने बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के विभिन्न पन्नों और स्तंभों से उन्हें परिचित कराया. उन्होंने वेब पत्रकारिता की कार्यशालाओं के बारे में भी जानकारी दी. लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉ रमेश चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि 1992 से यह विभाग सक्रिय है और इस संस्थान से पढ़े हुए अनेक विद्यार्थी पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं. पश्नोत्तर के दौरान छात्रों ने एक्ज़िट पोल, चुनाव आयोग की सख्ती के बारे में सवाल किए. उन्होंने बीबीसी में अवसरों के बारे में भी दिलचस्पी दिखाई. इस मौक़े पर भारत में बीबीसी की बिज़नेस डवलपमेंट मैनेजर विनीता द्विवेदी ने कहा कि रेडियो के साथ ऑनलाइन का भी तेज़ी से विस्तार हो रहा है. इस कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता विभाग के अध्यापक डॉक्टर मुकुल श्रीवास्तव ने किया. |
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