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निजी सवाल न पूछने के निर्देश दिए गए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने उस प्रावधान को वापस लेने का फ़ैसला किया है जिसके तहत कामकाज के सालाना आकलन के लिए भरे जाने वाले फॉर्म में महिला प्रशासनिक अफ़सरों को मासिक-धर्म के बारे में पूरी जानकारी देनी थी. कार्मिक मंत्रालय के सचिव सत्यानंद मिश्रा ने बीबीसी को बताया कि आकलन वाले फ़ॉर्म से आपत्तिजनक सवालों को हटाया दिया गया है. इस सिलसिले मे सीपीआई (एम) की सांसद और महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली बृंदा कारत ने एक शिष्टमंडल के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात की थी. बढते दबाव के बाद आख़िरकार भारत सरकार के कार्मिक मंत्रालय ने उन सवालों को हटाने का फैसला किया. महिला प्रशासनिक अधिकारियों ने इस बात को लेकर नाराज़गी जताई थी कि उनसे मासिक-धर्म संबंधी जानकारी देने के लिए कहा जा रहा है. भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के कामकाज का वार्षिक आकलन और उनकी स्वास्थ्य जाँच अनिवार्य है इसलिए इस फॉर्म को भरने से बचना अधिकारियों के लिए असंभव था. मांग महिला अधिकारियों की नाराज़गी सामने आने पर केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने मामले पर पुनर्विचार की बात कही थी. इस पूरे विवाद की जड़ में अप्रेजल फॉर्म का 58वाँ पन्ना था जिसे केंद्रीय कार्मिक, जनशिकायत और पेंशन मंत्रालय ने जारी किया था. फॉर्म में निर्देश दिए गए थे कि महिला अधिकारी अपने मासिक धर्म के बारे में विस्तृत जानकारी दें जिसमें पिछले मासिक धर्म की तारीख़ सहित मातृत्व अवकाश आदि के बारे में पूर्ण विवरण शामिल हो. बीबीसी से जिन महिला प्रशासनिक अधिकारियों ने बात की थी उनका यही कहना था कि इस तरह की निजी जानकारी माँगी गई थी वह किसी दृष्टि से उचित नहीं थी. महाराष्ट्र सरकार की संयुक्त सचिव सीमा व्यास का भी कहना था कि इस तरह के सवाल पूछने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी. |
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