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फिर की गई महिलाओं की उपेक्षा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तराखंड के सामान्य जीवन में महिलाओं की उपस्थिति किसी दूसरे प्रदेश की तुलना में कुछ अधिक दिखती है. और यह अधिक उपस्थिति सामान्य जीवन से ऊपर उठकर राजनीतिक जीवन में भी दिखती है. ख़ासकर तब, जब यह आँकड़ा मिलता है कि उत्तराखंड के आधे विधानसभा क्षेत्रों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक है. लेकिन यह उपस्थिति राजनीतिक दलों की उम्मीदवारों की सूची से बिलकुल नहीं झलकती. वहाँ स्थिति बिल्कुल दूसरी है. किसी भी राजनीतिक दल ने टिकट बाँटने में महिलाओं को प्राथमिकता सूची में नहीं रखा है. पुरुष प्रधान राजनीति राजनीति में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की ज़ोरदार वकालत करने वाले राजनीतिक दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के राज्य में 21 फ़रवरी को होने वाले चुनाव के टिकट वितरण में इसे भूल गए.
कांग्रेस ने 70 उम्मीदवारों में सिर्फ़ पाँच महिलाओं को टिकट दी है यानी सिर्फ़ सात प्रतिशत महिलाओं को. जबकि भाजपा ने कांग्रेस की तुलना में कुछ ज़्यादा महिला उम्मीदवारों को मौक़ा दिया है तो भी उसकी संख्या सात से अधिक नहीं पहुँची है. यानी दस प्रतिशत. कांग्रेस ने जहाँ अपनी राज्य महिला इकाई की अध्यक्ष को टिकट देने के बदले उनके बेटे को पसंद किया वहीँ भाजपा ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन की नेत्री सुशीला बलूनी की जगह एक ठेकेदार को. ऐसा नहीं है कि यह सोच सिर्फ़ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की है. उत्तराखंड राज्य के आंदोलन में महिलाओं की भूमिका की साक्षी रही पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) ने भी अपनी पार्टी की 64 टिकटों में से सिर्फ़ चार महिलाओं को दी है. बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का हाल भी ऐसा ही है. अवसरों की कमी हल्दवानी की निवासी रीता इस समय पढ़ाई कर रही हैं. वे मानती हैं कि इस समय उत्तराखंड राज्य में महिलाओं को किसी भी क्षेत्र में कोई मौक़ा नहीं मिल रहा है और उन्हें सिर्फ़ घर के कामकाज तक सीमित रख दिया गया है. वे कहती हैं, “बाहर के काम पुरुष के जिम्मे है. वह पैसा कमाता है और औरतों को घर संभालना है.”
रीता मानती हैं कि राज्य बनने के बाद पढ़ने के अवसर तो बढ़े हैं लेकिन यह भी होना चाहिए कि अगर कोई महिला पढ़ी लिखी है तो उसे उसके मुताबिक़ काम करने का मौक़ा भी मिले. लेकिन कर्णप्रयाग के पास एक गाँव में रहने वाली सुशीला मानती हैं कि महिलाओं के पास घर का कामकाज ही होता है उन्हें और काम की क्या ज़रुरत. वे कहती हैं, “सरकार हमारे बच्चों को नौकरी चाकरी दे, हमें इससे अधिक क्या चाहिए.” लेकिन नई पीढ़ी बदल रही है और उन्हें इससे भी अधिक चाहिए. अल्मोड़ा में पॉलीटेक्नीक की छात्रा वेदिता कहती हैं कि अभी राज्य में पढ़ाई की व्यवस्था तो ठीक हो गई है लेकिन रोज़गार के अवसर अभी भी कम हैं. इसलिए वेदिता पढ़ाई करने के लिए राज्य से बाहर जाना चाहती हैं. लेकिन वेदिता और रीता दोनों ही मानती हैं कि राजनीतिक दलों की प्राथमिकता सूची में महिलाओं की स्थिति सुधारना अभी भी नहीं है. टिहरी गढ़वाल की कंचन कहती हैं, “पहले बेरोज़गार पुरुषों को तो काम मिल जाए फिर हमारी बारी आएगी.” | इससे जुड़ी ख़बरें उत्तराखंड में विधायकों का ‘रिपोर्ट कार्ड’ 05 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस उत्तरांचल नहीं, अब उत्तराखंड29 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस कौन चुका रहा है टिहरी बांध की कीमत?07 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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