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सोमवार, 07 नवंबर, 2005 को 13:45 GMT तक के समाचार
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कौन चुका रहा है टिहरी बांध की कीमत?

टिहरी बांध
भागीरथी नदी के प्रवाह को रोककर बांध में पानी भरा जा रहा है
टिहरी में बन रहा विशाल बांध अपने आखिरी चरण में है.

भागीरथी को रोककर बांध में पानी भरा जा रहा है और अधिकारियों का दावा है कि अगले वर्ष जनवरी से बिजली पैदा करने का काम शुरू हो जाएगा.

कहा जा रहा है कि इस परियोजना से देश की राजधानी दिल्ली तक की बिजली और पानी की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा.

मगर टिहरी नगर और आसपास के 125 गाँवों को विकास के इस विशाल ढांचे की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है.

यकीन करना मुश्किल है कि आज जिस टिहरी में झील का हरा-मटमैला पानी फैला हुआ है वहां कभी भागीरथी की धारा हिमालयी चट्टानों से होड़ लेती हुई, उन्हें पछाड़ती हुई कलकल बहती थी.

और जो खंडहर दिख रहे हैं उन मकानों, मंदिरों, गलियो, चौराहों और चौबारों में जिंदगी के हर रंग धड़कते थे.

कभी टिहरी निवासी रहे और अब दिल्ली जाकर बस चुके मनोज रांगड़ अपने शहर को आखिरी बार देखने आए हैं.

 शहर का हाल देखकर झटका सा लगा. हमारा इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि जहां हमारा बचपन बीता वो आज मरघट बन चुका है
मनोज रांगड़, टिहरी निवासी

वो बताते हैं, "शहर का हाल देखकर झटका सा लगा. ये तो जैसे भूतों का शहर बन गया है. जो नदी यहां लहराती थी वो आज सूखी और स्तब्ध कर देने वाली है. हमारा इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि जहां हमारा बचपन बीता वो आज मरघट बन चुका है."

इस बाँध को बनाने की मंजूरी 1965 में मिल गई थी लेकिन इसे शुरू किया जा सका 1973 में, तब इसकी लागत थी 1500 करोड़ और पूरा होने का लक्ष्य था 1986.

लेकिन पर्यावरण, पुनर्वास और सुरक्षा जैसे मसलों के कारण विवादों में रहने के कारण यह अपने निर्धारित समय और लागत में नहीं बन पाया और आज इसकी लागत बढ़ कर 10,000 करोड़ तक पंहुच चुकी है.

फायदे

समुद्र की सतह से करीब 840 मीटर की ऊँचाई पर बने इस बांध से दो हज़ार चार सौ मेगावाट बिजली पैदा होगी.

इस उत्पादन का 12 प्रतिशत उत्तरांचल के हिस्से में आएगा जबकि बाकी बिजली दिल्ली और उत्तर प्रदेश को दी जाएगी.

टिहरी शहर
टिहरी शहर सहित 125 गांव इस बांध की झील में समा जाएंगे

बांध से लाखों क्यूसेक्स पीने का पानी मिलेगा जिससे राजधानी दिल्ली की भी पानी की किल्लत दूर होगी.

बांध से सात बड़ी नहरें निकाली जाएगी जिससे क़रीब छह लाख हेक्टेअर बंजर ज़मीन की सिंचाई भी होगी.

इस बांध की झील में नावें चलाई जाएंगी और इसे एक बड़े पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा.

बांध बना रही एजेंसी, टिहरी पनबिजली निगम के मुख्य महाप्रबंधक एससी शर्मा कहते हैं, "ये बांध उत्तर भारत की सिंचाई, बिजली और पानी की जरूरतों को पूरा करने में मील की पत्थर साबित होगा और अगले वर्ष अक्तूबर से इसके फायदे महसूस किए जाने लगेंगे जब बांध के जलाशय से सिंचाई और पीने के लिए पानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश को मिलने लगेगा."

समस्या

पर ऐसा नहीं है कि इस बाँध से लोगों को सहूलियतें ही हैं बल्कि कई तरह की समस्याएँ भी हैं.

बांध से तैयार होने वाली 42 वर्ग किलोमीटर विशाल झील पाँच हज़ार, दो सौ हेक्टेअर ज़मीन को जलमग्न कर देगी जिसमें टिहरी नगर के साथ-साथ 125 गांव भी डूबेंगे.

टिहरी शहर
जनसंगठन लगातार इस बांध के निर्माण और पुनर्वास के सवालों पर विरेध दर्ज कराते आए हैं

अगर सरकारी दावों पर यकीन करें तो प्रभावित परिवारों में से अधिकांश का पुनर्वास किया जा चुका है लेकिन अगर दूसरी ओर मानवाधिकार संगठन, पीयूसीएल की रिपोर्ट पर नजर डालें तो पुनर्वास के काम में बड़ी अनियमितताएं रही हैं और बांध पुनर्वास के नाम पर जो छह सौ करोड़ खर्च किए गए उसमें से विस्थापितों के हिस्से सिर्फ 94 करोड़ रूपए आए.

इसी बजट से जिलाधिकारी के लिए 47 लाख रूपए की लागत का बंगला बनवाया गया और पुलिस अधीक्षक के लिए 43 लाख का बंगला बना.

पीयूसीएल कार्यकर्त्ता महिपाल सिंह नेगी कहते हैं, "पुनर्वास नहीं पानी का भय दिखाकर लोगों को पलायन के लिये मजबूर किया गया."

इतिहास

टिहरी का डूबना सिर्फ़ एक शहर का नहीं बल्कि गढ़वाल-हिमालय के राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र की जलसमाधि है.

हजारों-लाखों लोगों के लिए इसका मतलब अपनी जड़ों से उखड़ना और अपनी पहचान खो देना है.

 अफ़सोस यह है कि यहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखने की सुध किसी ने नहीं ली वरना वास्तुकला और गौरवपूर्ण संस्कृति के अवशेष कबाड़ियों के हाथ न बिकते
विद्यासागर नौटियाल

टिहरी का ऐतिहासिक घंटाघर, राजा का महल और कचहरी वास्तु और स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना थे.

प्रसिद्ध कवि गुमानी पंत और पहाड़ी चित्रकला के मशहूर चितेरे मौलाराम ने यहीं पर कला साधना की.

यहां के मूल निवासी प्रख्यात साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल कहते हैं, "अफ़सोस यह है कि यहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखने की सुध किसी ने नहीं ली वरना वास्तुकला और गौरवपूर्ण संस्कृति के अवशेष कबाड़ियों के हाथ न बिकते."

बहरहाल जैसे-जैसे झील का जलस्तर बढ़ रहा है, लोग छलछलाती आंखों और भरे मन से अपने-अपने घरों को खाली करके जा रहे हैं.

उनके मन में सिर्फ़ एक ही सवाल है कि काश इतनी बड़ी बांध परियोजना को शुरू करने के पहले सरकार ने स्थानीय लोगों की राय भी ली होती और उनका भी भला सोचा होता.

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