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शनिवार, 18 जून, 2005 को 07:10 GMT तक के समाचार
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मानसून आने से पहले उजाड़ने का फ़ैसला

पुनर्वास के लिए आंदोलन
पुनर्वास को लेकर सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ आंदोलन लंबे समय से चल रहा है
मानसून आने को कुछेक दिन ही बचे हैं और मध्यप्रदेश सरकार ने एक ऐसा फ़ैसला किया है जिसके चलते हज़ारों लोगों के घर-बार उजड़ने की आशंका पैदा हो गई है.

और अब सरकार कह रही है कि उनको दूसरी जगह बसाने की व्यवस्था की जाएगी.

हालांकि सरकार का निर्णय अदालत के उस निर्णय के ख़िलाफ़ है जिसमें कहा गया है कि पुनर्वास छह महीने पहले हो जाना चाहिए.

नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने इस फ़ैसले का विरोध करते हुए कहा है कि पहले जिनके घर-बार और खेती बाड़ी डूबे हैं उनको तो अब तक मुआवज़ा नहीं मिला है.

निर्णय

मध्यप्रदेश सरकार ने नर्मदा पर बने इंदिरा सागर जलाशय को इस मानसून में पूरी क्षमता यानी 262 मीटर भरने का निर्णय लिया है.

हालाँकि इस कारण डूब क्षेत्र में आने वाले इलाकों में बसे हज़ारों परिवारों को अभी भी दूसरे उपयुक्त स्थानों पर बसाया जाना बाक़ी है.

पहली जून को एक उच्चस्तरीय बैठक में राज्य के मुख्य सचिव विजय सिंह ने प्रोजेक्ट से जुड़ी समस्याओं और सरकारी अमलों को र्निदेश दिया कि बाकि बचा पुनर्वास का काम मानसून आने से होने से पहले समाप्त कर दिया जाए.

बाँध को पूरी क्षमता तक भरने का फैसला भी इसी बैठक में लिया गया.

भारत के सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि पुनर्वास का काम किसी भी क्षेत्र के डूब में आने के छह महीने पहले ही समाप्त हो जाना चाहिए.

संख्या पर विवाद

पुनर्वास के लिए बचे हुए लोगों की संख्या भी राज्य सरकार और एनएचडीसी अलग-अलग बता रहे हैं. एनएचडीसी के मुताबिक यह 2900 से कुछ ज़्यादा है.

जबकि राज्य सरकार द्वारा जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार इंदिरा सागर परियोजना से प्रभावित होने वाले चार हज़ार परिवार ऐसे हैं जिनका पुनर्वास अभी बाक़ी है.

 इन एक लाख डूब प्रभावित लोगों में करीब 25 हज़ार तो ऐसे हैं जो सीधे डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. बड़ी बाँध के गेट बंद होने से गेट से पहले पड़ने वाले नर्मदा के हिस्से और तक़रीबन 75 हज़ार लोगों के घर और खेती की ज़मीन डूबने की आशंका है
चित्ररुपा पलित, सामाजिक कार्यकर्ता

ग़ैर सरकारी संगठन नर्मदा बचाओ आंदोलन के अनुसार अगर इंदिरा सागर के जलाशय पूरे भर दिये गए तो तक़रीबन एक लाख लोग बेघर हो जाएँगें.

जिनमें से काफ़ी को तो मुआवज़ा ही नहीं मिला है. जिन्हें मिला है वह भी आधा अधूरा ही है. साथ ही डूब में आने वाले एक बड़े क्षेत्र का सर्वेक्षण ही नहीं हुआ है.

संगठन कार्यकर्ता चित्ररूपा पलित का कहना है, "इन एक लाख डूब प्रभावित लोगों में करीब 25 हज़ार तो ऐसे हैं जो सीधे डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. बड़ी बाँध के गेट बंद होने से गेट से पहले पड़ने वाले नर्मदा के हिस्से और तक़रीबन 75 हज़ार लोगों के घर और खेती की ज़मीन डूबने की आशंका है."

उनका कहना है, “बैक वाटर से प्रभावित होने वाले हज़ारों परिवारों का तो अब तक सर्वेक्षण तक नहीं हुआ है."

इसी बीच राज्य सरकार द्वारा बाँध से प्रभावित होने वाले गाँवों और परिवारों को लेकर एक सर्वेक्षण में काफी त्रुटियाँ पाई गई हैं.

इंदिरा सागर परियोजना में पड़ने वाले तीन ज़िलों में से एक देवास में तीन गाँव टिप्पस, फतेहगढ़ और भामर ऐसे पाए गए हैं जो डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. जबकि सर्वे में इन्हें डूब क्षेत्र से बाहर दिखाया गया था.

हरदा प्रशासन ने भी अपने ज़िले में सर्वे की कमियों के सिलसिले में आला अधिकारियों को एक चिट्ठी लिखी है.

ग़लत सर्वेक्षण

इन शिकायातों के मद्देनज़र राज्य सरकार ने एक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया है जो अभी जारी है.

नदियों पर बाँध बँधने से पास के इलाकों में डूब की स्थिति को लेकर किये गये सर्वेक्षण पहले भी ग़लत साबित हुए हैं.

अस्सी के दशक में जबलपुर में बनी बावड़ी परियोजना पर किये गये सर्वे में एक सौ एक गाँवों को डूब में बताया गया था जबकि बाँध के जलाशय को पूरा भरे जाने के दौरान 164 गाँव डूब गए.

ऐसी ही स्थिति होशंगाबाद में बने तवा और रायसेन की बरना परियोजनाओं में भी देखी गई.

आकस्मिक कार्ययोजना

एक सरकारी वेबसाइट पर कहा गया है कि मुख्य सचिव ने खंडवा, देवास और हरदा ज़िले के कलेक्टरों को पुनर्वास के संबंध में एक सुविचारित आकस्मिक कार्य योजना बनाने और उसे लागू करने की सलाह दी है.

 पुनर्वास जैसे उलझे कार्य में आकस्मिक कार्य योजना कैसे सफ़ल हो सकती है. साथ ही मानसून से ठीक 15-20 दिन पहले इस तरह के आदेश जारी करने का परिणाम लोगों के साथ ज़ोर ज़बर्दस्ती होगी
राकेश दीवान

पर्यावरण से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान का कहना है, "पुनर्वास जैसे उलझे कार्य में आकस्मिक कार्य योजना कैसे सफ़ल हो सकती है. साथ ही मानसून से ठीक 15-20 दिन पहले इस तरह के आदेश जारी करने का परिणाम लोगों के साथ ज़ोर ज़बर्दस्ती होगी."

इंदिरा सागर परियोजना का निर्माण कर रही कंपनी नर्मदा हाइड़्रो डेवलमेंट कार्पोरेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एसके डोडेला ने कहा कि अभी की कार्ययोजना सिर्फ़ पहले से चल रहे पुनर्वास कार्यों को समाप्त करने से संबंधित है.

लेकिन जब उनसे पूछा गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के दिशा निर्देश के अनुसार यह काम क्या किसी क्षेत्र को डूब में लाने के 6 महीने पहले समाप्त नहीं कर लिया जाना चाहिए था तो उन्होंने कहा कि ये क़ानून इंदिरा सागर परियोजना पर लागू नहीं होते और इस प्रोजेक्ट के लिए राज्य सरकार की अपनी पुनर्वास योजना है.

इंदिरा सागर परियोजना को तैयार करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर कार्पोरेशन के साथ मिलकर जब एक नई कंपनी नर्मदा हाइड्रो डेवलपमेंट कार्पोरेशन का गठन किया थो तो इस समझौते में साफ़ कहा गया था कि कंपनी नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण के निर्देशों का पालन करेगी.

नर्मदा बचाओं आंदोलन के आलोक अग्रवाल ने कहा, "एनएचडीसी के रवैए से ही साफ़ है कि कंपनी पुनर्वास को सही तरीक़े से करने में कितनी दिलचस्पी रखती है."

लेकिन एसयू डोडजा का कहना था कि लोगों को घर और खेती की ज़मीन का मुआवज़ा देने का काम पहले से चल रहा है और अब वह अंतिम चरण में है.

हालाँकि उन्होंने माना कि यह कार्य योजना पहले समाप्त हो जाना चाहिए था.

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