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असम की हज़ारों लापता महिलाओं की कहानी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले दस सालों में असम की हज़ारों महिलाएँ लापता हुई हैं जिनमें सभी उम्र की महिलाएँ शामिल हैं. हाल की एक पुलिस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1996 से 3184 महिलाएँ और 3840 बालिकाएँ लापता हुई हैं. देखा जाए तो प्रतिदिन औसतन दो महिलाएँ लापता हुई है. इस रिपोर्ट को असम पुलिस और ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एंड डेवलवपमेंट ने मिलकर तैयार किया है. असम पुलिस के खुफ़िया विभाग के प्रमुख खगेन सरमा का कहना है कि स्थानीय पुलिस के अलगाववादियों के ख़िलाफ कार्रवाई में व्यस्त होने के कारण पुलिस के अन्य काम प्रभावित हुए हैं. सरमा कहते हैं, "ज़्यादातर पुलिसकर्मी दूसरे अपराधों से निपटने की जगह विद्रोहियों से लड़ने में ही उलझे हैं." असम पुलिस ने हाल में कुछ ऐसी लड़कियों को बचाया जिन्हें दिल्ली के आसपास के इलाकों में कॉल-गर्ल का काम करने को मजबूर किया गया था. कई लापता लड़कियाँ पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में यौनकर्मियों की तरह भी काम कर रही थीं. विस्थापन असम में हिंसा के कारण हज़ारों विस्थापित लोग शिविरों में रह रहे हैं. 1990 के दशक में विशेष तौर पर कोकराझार ज़िले से अनेक लोग विस्थापित हुए और अब असम में इन लोगों की संख्या लगभग 25 लाख है. पुलिस के एक सर्वेक्षण के मुताबिक महिलाऔं का व्यापार करने वाले गिरोह ख़ूबसूरत महिलाओं को राज्य से बाहर नौकरी दिलाने का झाँसा देते हैं. शिविरों में रहने वाले उनके माता-पिता को कुछ हज़ार रुपए पेशगी में दे दिए जाते हैं और उन्हें कहा जाता है कि एक बार जब उनकी लड़कियों को काम मिल जाएगा तो वे उनको नियमित रूप से पैसे भेजती रहेंगी.
कोकराझार के नज़दीक जयपुर राहत शिविर में रहने वाले जाम सिंह लाकरा कहते हैं, "हमारे कैंप से करीब बीस लड़कियाँ नौकरी के लिए गईं लेकिन फिर लौटकर नहीं आईं." ज़्यादातर परिवार इन लापता महिलाओं के बारे में बात करने से हिचकिचाते हैं लेकिन कुछ परिवारों ने इस बारे में आवाज़ उठाई है. विस्थापित महिलाओं की समस्याओं का अध्ययन कर रहीं प्रोफेसर पाउला बैनर्जी कहती हैं, "दुनिया भर में जातीय संघर्षों ने बड़े पैमाने पर महिलाओं को विस्थापित किया है और इससे महिलाओं के अवैध व्यापार को बल मिलता है. असम की स्थिति कोई अलग नहीं है." भयानक ग़रीबी ऐसा भी देखा गया है कि असम की कुछ महिलाओं को स्थानीय पोर्नोग्राफिक यानि अश्लील फ़िल्मों में काम करने को मजबूर किया जाता है. कई शिक्षित और अच्छे घरों की लड़कियाँ दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में होटलों या रिसोर्ट में नौकरी करने के उद्देश्य से आती हैं लेकिन धीरे-धीरे इस पेशे में उतार दी जाती हैं.
इंद्राणी बोरा और रितु बोरगोहैन ऐसी ही लड़कियाँ हैं जो सात महीने पहले गुवाहाटी से गुड़गाँव में नौकरी करने आईं लेकिन फिर उन्हें धीरे-धीरे इस पेशे में उतार दिया गया. हाल ही में असम पुलिस की एक टीम ने उन्हें इस चंगुल से मुक्त करवाया. महिलाओं के इस पेशे में धकेले जाने का एक कारण भयानक ग़रीबी भी है. कलकत्ता रिसर्च ग्रुप ने अपने हाल के एक अध्ययन में पाया है कि असम की विस्थापित महिलाएँ भयंकर ग़रीबी में अपना जीवन व्यतीत करती हैं और कोई भी नौकरी करने को तैयार हो जाती हैं. यही कारण है कि जब संदिग्ध लोग भी इन्हें नौकरी करने का प्रस्ताव करते हैं तो वे तैयार हो जाती हैं. कलकत्ता स्थित एक शोध संस्था सीएसएसएस की उद्दीपना गोस्वामी कहती हैं, "ऐसा इसलिए होता है कि सरकारी राहत शिविरों में इनके आजीविका के लिए कोई विकल्प नहीं उपलब्ध करवाया जाता है. इनमें से कई महिलाएँ हस्तकला में निपुण होती हैं लेकिन इसे उनके आय का ज़रिया बनाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जाता." (पहचान गुप्त रखने के उद्देश्य से महिलाओं के नाम बदल दिए गए है.) | इससे जुड़ी ख़बरें कश्मीर में महिलाओं पर चौतरफ़ा दबाव18 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'दंतेवाड़ा कैंपों में महिलाओं का शोषण'18 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस आधी दुनिया...पर कितनी अधूरी06 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस सेक्स स्कैंडल से नाराज़ हैं लोग..19 मई, 2006 | भारत और पड़ोस मानवाधिकार आयोग ने रिपोर्ट माँगी02 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस उन्हें मिले 'मनोरंजनकर्मी' का दर्जा27 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस पाकिस्तानी यौनकर्मी पहुँचीं कोलकाता22 जून, 2005 | भारत और पड़ोस देश भर की लड़कियाँ बिकती हैं हरियाणा में31 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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