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कश्मीर में महिलाओं पर चौतरफ़ा दबाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चरमपंथी हिंसा और अस्थिरता के दौर में क्या भारतीय कश्मीर का सामाजिक तानाबाना भी बदल रहा है? जहाँ कश्मीर में महिलाओं की भूमिका बदल रही है वहीं उनके लिए शादी अब बड़ी प्राथमिकता नहीं रही है. जहाँ पहले आम तौर पर लड़कियों की शादियां 18 से 25 की उम्र के भीतर होती थी, कई शहरी इलाक़ों में अब यह उम्र बढ़कर 35 तक पहुँच गई है. कश्मीर यूनिवर्सिटी में मीडिया प्रोफ़ेसर और महिलाओं के मसलों पर लिखने वाली सईदा अफ़शां इसकी दो वजहें गिनाती हैं. पहली यह कि पिछले 15 सालों में राज्य सरकार ने अपने महकमों में नई नियुक्तियों पर रोक लगा रखी है. जिन्हें नौकरियां मिल भी रही हैं वो ज़्यादातर कॉन्ट्रैक्ट पर यानी अस्थायी तौर पर मिल रही हैं. वादी में हिंसा के चलते बाहर से निवेश हो नहीं रहा, निजी कंपनियाँ बहुत कम हैं और पर्यटन उद्योग लगभग ठप्प हो गया है. इन सब का असर रोज़गार पर पड़ा है और बेरोज़गार के साथ शादी कोई आकर्षक सुझाव तो है नहीं. मजबूरियाँ आर्थिक तंगी ने कश्मीर में शादी के लिए कई लड़कियों के सामने एक और शर्त रखी है, लड़की कमाऊ होनी चाहिए. और बहुत लोग तो चाहते हैं कि लड़की के पास पक्की सरकारी नौकरी हो.
सईदा अफ़शां का कहना है कि दूसरी वजह यह कि पिछले पंद्रह सालों में सुरक्षाबलों या चरमपंथियों के हाथों बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं. मारे गए लोगों में लगभग अस्सी प्रतिशत लोग युवा थे. इतने लोगों का मारा जाना या लापता हो जाना भी लड़कियों की शादी में देरी का एक कारण है. मगर कश्मीर में कोई महिला या उसके परिवार वाले यह स्वीकार नहीं कर पाते कि वाक़ई उनके घरों में शादी के इंतज़ार में बैठी लड़कियों की उम्र बढ़ती जा रही है. चरमपंथी हिंसा के माहौल ने महिलाओं की दुनिया को शायद हमेशा के लिए बदल कर रख दिया है और महिलाओं का एक तबका और है जो इससे प्रभावित हुआ है. वे हैं विधवाएं जिनके पति चरमपंथियों या सुरक्षाबलों की गोलियों का शिकार हुए हैं. कश्मीर टाइम्स की पत्रकार अफ़साना रशीद ने विधवाओं की समस्याओं का अध्ययन किया है, वे कहती हैं कि कश्मीर में जितने विधवाएँ हैं उसमें से कम से कम अस्सी प्रतिशत दोबारा शादी कर सकती हैं मगर उनके पास यह विकल्प नहीं बचा है. वजह यह कि या तो उनके दो-तीन बच्चे हैं या फिर उन पर अपने परिवार की देखभाल की ज़िम्मेदारी है. बदलाव एक बात इससे साफ़ हो रही है कि कश्मीरी महिला की परिवार में समाज में भूमिका तेज़ी से बदल रही है. या वो परिवार की कमाई में आर्थिक योगदान दे रही हैं या कहीं अकेले अपने परिवार का पेट पालने के लिए चार दीवारी से बाहर निकल रही हैं. अपनी नई पहचान बना रही हैं.
महिला अधिकार विशेषज्ञ सईदा अफ़शां कहती हैं अब पारंपरिक सोच रखने वाले परिवार हों या पुरुष बहुल राजनीति, सबको महिलाओं की नई पहचान को गंभीरता से लेना पड़ रहा है. यह परिवर्तन अब कश्मीर की सड़कों पर है. पुलिसवालों और सेना अधिकारियों से अपने लापता परिजनों की ख़बर लेने के लिए महिलाएँ ज्यादा पहुँचती हैं. विरोध प्रदर्शनों में इनकी तादाद पहले से कहीं ज्यादा है. परंपराओं और आधुनिक सच्चाइयों के बीच रास्ते बनाती कश्मीरी महिलाओं की आकांक्षाएँ कश्मीर के राजनीतिक और सामाजिक भविष्य पर कैसी छाप छोड़ेगी यह भी धीरे-धीरे सामने आएगा. |
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