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आधी दुनिया...पर कितनी अधूरी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया की आधी आबादी हैं महिलाएँ. पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने में समर्थ फिर भी कहीं पीछे छूटी हुईं. ऐसा नहीं है कि महिलाओं को उनका जायज़ हक़ नहीं मिला. महिला राष्ट्रपति हैं, प्रधानमंत्री हैं, अंतरिक्ष वैज्ञानिक हैं और नोबेल पुरस्कार विजेता भी. लेकिन कितनी कुछ गिनी-चुनी ही न. ऐसा न होता तो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की ज़रूरत क्यों पड़ती? यह अहसास दिलाने की ज़रूरत क्यों पड़ती कि महिलाएँ भी समाज का एक हिस्सा हैं. आज अगर महिलाएँ कहीं आगे हैं या उच्च पदों पर आसीन है तो यह उनको ख़ैरात में नहीं मिला है. इसके पीछे बरसों की जद्दोजहद और संघर्ष शामिल है. भारत की आज़ादी के पचास वर्ष पूरे होने पर जब बीबीसी हिंदी सेवा ने मुझे एक विशेष रेडियो श्रंखला तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी तो मैंने भारत में महिलाओं की स्थिति का ही विषय चुना. उस दौरान अलग-अलग वर्ग की अनेक महिलाओं से मुलाक़ात करने का मौक़ा मिला और मैंने पाया कि महिलाओं में बहुत कुछ करने की सामर्थ्य हैं. सामर्थ्य पर सुविधा नहीं बहुत से परिवार ऐसे हैं जहाँ बेटे और बेटी में फ़र्क़ नहीं किया जाता है और वहाँ लड़की को आगे बढ़ने के समुचित अवसर मुहैया कराए जाते हैं.
लेकिन दुर्भाग्य से भारत में अब भी आमतौर पर बेटी को बोझ समझने की प्रवृत्ति का पूरी तरह सफ़ाया नहीं हुआ है. आज भी महिला घरेलू हिंसा का शिकार है. और यह अभिशाप केवल भारत के ही हिस्से में नहीं आया है. पश्चिमी देशों में भी स्थिति कोई बहुत बेहतर नहीं है. मेरी सहयोगी वंदना ने जब इस विशेष प्रस्तुति की ख़ाका खींचा तो मुझे भी लगा कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौक़े पर बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लाखों जागरूक पाठक और पाठिकाओं को एक बार फिर याद दिलाया जाए कि उनके आसपास समाज का एक वर्ग आज भी अनेक सुविधाओं से वंचित है. इस विशेषांक में आपको महिलाओं से जुड़े अनेक पक्षों पर अलग-अलग विचार पढ़ने को मिलेंगे. कामयाब महिलाएँ उन महिलाओं की आपबीती भी आप पढ़ पाएँगे जिन्होंने अपनी एक पहचान क़ायम करने में सफलता पाई. साथ ही खेल जगत की जानीमानी हस्तियों और पुलिस विभाग जैसे क्षेत्रों में काम कर रही महिलाओं पर भी हम एक नज़र डाल रहे हैं. बीबीसी हिंदी की यह पेशकश उन महिलाओं को समर्पित है जो सारी वंचनाओं, सारी वर्जनाओं से निपट कर अपने अस्तित्व का अहसास दिला रही हैं. लेकिन साथ ही उन महिलाओं को भी सलाम जो लाख कोशिश के बाद भी समाज की बनाई ज़ंजीरों से स्वंय को मुक्त नहीं करा पा रही हैं. |
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