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शुक्रवार, 22 दिसंबर, 2006 को 11:44 GMT तक के समाचार
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'सुनामी पीड़ित नए घर से नाख़ुश'
सुनामी पीडित
सुनामी पीडित अपने नए घर से खुश नहीं हैं.
ग़ैर-सरकारी संगठनों के समूह ने सुनामी पुनर्वास कार्यक्रम में पीड़ितों को शामिल नहीं किए जाने पर सरकार की काफ़ी आलोचना की है.

एक्शन एड के नेतृत्व में तीन ग़ैर-सरकारी संगठनों ने कहा है कि पूर्वी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के सुनामी पीड़ित नए घर से खुश नहीं हैं.

सरकार ने इस क्षेत्र में पीड़ितों के लिए साढ़े आठ हज़ार मकान बनवाए हैं और लोगों को अब इन घरों में भेजा भी जा रहा है.

एक्शन एड, सोसायटी फॉर अंडमान निकोबार इकोलॉजी और सुनामी रीलिफ इंटरनेशनल नेटवर्क ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ''पूरी दुनिया में आपदाओं से पीड़ित लोगों के पुनर्वास कार्यक्रम में प्रभावितों को शामिल किया जाता है ताकि उन्हें संतुष्टि मिल सके लेकिन अंडमान में ऐसा नहीं हुआ.''

रिपोर्ट में कहा गया है, ''हालांकि लकड़ी से बने पारंपरिक घर अंडमान में आसानी से भूकंप के झटके को झेल गए इसके बावजूद अधिकारियों ने धातु के ढाँचे से घर बनवाए हैं.''

आरामदेह नहीं

एक्शन एड के प्रयाग वत्स कहते हैं, ''इससे स्थानीय लोग खुश नहीं हैं. स्टील और टीन के ढाँचे से मकान बनाते समय अंडमान के जलवायु को ध्यान में नहीं रखा गया. इस द्वीप समूह का जलवायु गर्म है और इसमें काफ़ी आर्द्रता भी है.''

टीन के मकान में धूप की तपिश को झेलना काफ़ी मुश्किल होता है

सोसायटी फॉर अंडमान निकोबार इकोलॉजी के समीर आचार्या कहते हैं, '' द्वीप समूह के लोगों ने धातु से मकान बनाए जाने का विरोध किया है. इसकी क़ीमत भी दस लाख रुपए है.''

आचार्या कहते हैं, ''यह काफ़ी महँगा है. सुनामी पीड़ितों को सिर्फ़ औजार, अंडमान के जंगलों में मौजूद लकड़ियाँ और कुछ महीनों के लिए आर्थिक सहायता चाहिए थी. इतनी मदद मिल जाती तो वे अपनी ज़रूरतों के हिसाब से अपना घर बना लेते.''

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अंडमान में अलग-अलग परिवेश के लोग रहते हैं लेकिन सरकार ने सबके लिए एक ही तरह के मकान बनवा दिए हैं. ये पूरे देश में बनाए जाने वाले सरकारी मकान की तरह ही दिखते हैं.

विरोध

रिपोर्ट के अनुसार पूरे द्वीप समूह के लोग मकान में धातु के प्रयोग से तो नाराज है हैं उन्हें जिस क्षेत्र में घर दिए गए हैं उससे भी खुश नहीं हैं.

क्षेत्रीय आदिवासी नेता आयशा माजिद कहती हैं, '' सुनामी के बाद अंडमान में बनाए गए मकान किसी काम के नहीं हैं. यह दिखाता है कि प्रशासन कितना निष्क्रिय है और अफसरशाह आम लोगों की ज़रूरतों को लेकर कितने ग़ैर-ज़िम्मेदार हैं.''

उन्होंने कहा, '' रिपोर्ट में सही ही कहा गया है कि इन मकानों में रहना और इनका रखरखाव स्थानीय लोगों के लिए काफ़ी मुश्किल होगा.''

वे कहती हैं, '' स्थानीय लोग लकड़ी के घरों मे रहने के आदी हैं और उन्हें इस तरह के घरों के बारे में जानकारी नहीं है. इसलिए जब भी मरम्मत कराना होगा ठेकेदार को बुलाना होगा.''

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